Sunday, June 6, 2010
कहीं डेट... ना बन जाए रेप
पार्टी से निकलते-निकलते दोनों को रात के ग्यारह बज गए। बाइक पर राहुल शिल्पा से छेड़छाड़ करने लगा। शिल्पा ने उसे रोकना चाहा तो उसने जबरदस्ती करने की कोशिश की। संयोग से वे दोनों सड़क पर थे, इसलिए राहुल चाह कर भी उसके साथ ज्यादा कुछ नहीं कर पाया। लेकिन अगले दिन शिल्पा को समझ में आ गया कि राहुल ने उसकी कोल्ड ड्रिंक में शराब मिला दी थी, ताकि वह नशे में उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ कर सके। शुक्र है शिल्पा किसी तरह बच गई।
बड़े महानगरों में यह एक ट्रैंड-सा बनता जा रहा है। युवा और किशोरियां तक डेट पर जाने के लिए लालायित रहती हैं। आठवें और नवें दशक तक मध्यवर्ग की लड़कियां बॉयफ्रैंड बनाने में बेहद संकोच करती थीं। जिन लड़कियों के बॉयफ्रैंड हुआ भी करते थे, उन्हें मित्रमंडली ही अच्छी नजर से नहीं देखती थी, लेकिन आज सब कुछ बदल गया है। आज कॉलेज गर्ल्स की बात तो छोड़ दीजिए आठवीं, नवीं तक में पढ़ने वाली लड़की भी बॉयफ्रैंड चाहती है। दिलचस्प बात है कि जिन लड़कियों के बॉयफ्रैंड नहीं होते, उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है और उनका मजाक उड़ाया जाता है। लिहाजा जवान होती लड़कियों के लिए बॉयफ्रैंड का होना एक आवश्यक शर्त-सी बनता जा रहा है।
ऐसे में डेटिंग पर और पार्टियों में जाना आम बात हो गयी है। लेकिन पिछले कुछ सालों में ऐसी अनेक घटनाएं देखने में आई हैं, जिनमें लड़की अपने बॉयफ्रैंड के साथ डेट पर गई और वहां उसके साथ उसके दोस्तों ने मिल कर बलात्कार कर दिया। ताजातरीन मामला टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस की 23 वर्षीया अमेरिकी छात्र का है, जिसे नशीला पदार्थ खिला कर उसी के छह दोस्तों ने उसके साथ बलात्कार किया। गोवा का वह केस भी अभी तक जेहन में ताजा है, जिसमें एक लड़की को सिगरेट में नशीला पदार्थ देने के बाद उसी के दोस्तों ने लड़की के साथ बलात्कार किया था। दिल्ली में भी दो साल पहले एक ब्रिटिश महिला के साथ उसी के होटल रूम में नशीला पदार्थ खिला कर एक दोस्त ने बलात्कार किया था।
इन तीनों ही घटनाओं में जो कॉमन चीज है, वह है कि बलात्कार करने वाला लड़की का दोस्त और भरोसेमंद था, लेकिन मौका मिलते ही उसने लड़की के साथ बलात्कार कर दिया। वास्तव में समाज में जो खुलापन आ रहा है, उसने लड़कियों को भी सेक्स के मामले में उन्मुक्त होने का मौका दिया है और पुरुष इस स्थिति का फायदा उठा रहे हैं। पश्चिमी दुनिया से आई डेट रेप की अवधारणा अब भारत में भी दिखाई दे रही है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली एक लड़की ने नाम ना लिखने की शर्त पर बताया कि यहां पढ़ने वाली कई लड़कियां डेट रेप का शिकार होने से बची हैं। मजबूरी में वे ऐसे मामलों की कोई शिकायत भी दर्ज नहीं करवातीं। दिल्ली की ही रहने वाली 30 वर्षीया शौर्या रॉय कहती हैं कि मुझे कुछ साल पहले की एक घटना याद है। मैं फार्महाउस में एक पार्टी में थी। मैंने देखा कि वहां एक कमरा अंदर से बंद है। मैंने सोचा शायद वहां कोई कपल होगा। मैं वहां से जाने ही वाली थी कि किसी ने मुझे बताया कि मेरी ही एक दोस्त ने बहुत ज्यादा पी ली थी और एक लड़का उसे उस कमरे में ले गया है। वह लड़का मेरी दोस्त को बहुत ज्यादा जानता भी नहीं था। हम सब कमरे की ओर भागे। दरवाजा खुलवाया तो हमने देखा कि लड़की एकदम निर्वस्त्र पड़ी थी। लड़के को धक्के मार कर बाहर निकाला गया। लड़की को कपड़े पहनाये गए। काफी देर बाद उसे होश आया। बाद में लड़की ने इसकी शिकायत करवाने से भी इनकार कर दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील और महिलाओं के मुद्दों पर नियमित रूप से लेखन करने वाले अरविंद जैन कहते हैं कि डेट रेप के मामले में लड़की शिकायत करती है तो भी उसका पक्ष कमजोर हो जाता है, क्योंकि वह लड़के को जानती है, अपनी मर्जी से उसके पास गई होती है। बस आरोपी के वकील को यह साबित करना होता है कि सेक्स संबंध बनाने में लड़की की भी उतनी ही रुचि थी, जितनी लड़के की। वह आगे कहते हैं कि यूं तो देश में बलात्कार कानून में वैसे ही इतने लूपहोल्स हैं, लेकिन डेट रेप के मामले में तो अक्सर फैसला लड़कों के ही पक्ष में होता है।
अक्सर लड़कियां भी यह समझती हैं कि डेट पर जाने का अर्थ है सेक्स के लिए सहमति देना। लड़कियों के पास सेक्स संबंध बनाने से मना करने का अधिकार है। वे कभी भी इससे इनकार कर सकती हैं। लड़कियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि डेट पर जाने के लिए हां कहने का अर्थ यह नहीं है कि वे सेक्स के लिए भी तैयार हैं।
शादी का वादा और सेक्स का इरादापिछले दिनों दिल्ली की एक अदालत ने लड़कियों को आगाह करते हुए कहा कि वे महज शादी के वादे के बाद ही अपने बॉयफ्रैंड से शारीरिक संबंध ना बनाएं, बल्कि अपनी अक्ल का भी इस्तेमाल करें। गौरतलब है कि जून 2006 में एक लड़की ने कालकाजी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करायी थी। इस शिकायत में कहा गया था कि उसका बॉयफ्रैंड चार साल से शादी का वादा करके उसके साथ बलात्कार कर रहा है।
इस मामले में एडिशनल सेशन जज अरुण कुमार आर्य ने शादी का झांसा देकर लड़की को शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर करने के मामले में कहा कि अपने शरीर की हिफाजत करना किसी भी लड़की का मौलिक दायित्व है। जस्टिस आर्य ने दिल्ली हाईकोर्ट के हाल के एक फैसले का उदाहरण देते हुए कहा कि शादी के वादे पर यकीन कर लड़कियों का पुरुषों से नजदीकी बढ़ाना आत्मघाती होगा और स्वच्छंदता के दायरे में आएगा।
दिलचस्प बात है कि शादी का ही नहीं, अन्य वादों के बाद भी लड़कियां पुरुषों से शारीरिक संबंध बना लेती हैं। इसका ताजा उदाहरण है ‘फैशन’ और ‘जेल’ जैसी हिट फिल्मों के निर्देशक मधुर भंडारकर पर प्रीति द्वारा लगाए गए आरोप। इनमें प्रीति ने कहा है कि मधुर ने उन्हें अपनी फिल्म की नायिका बनाने का वादा किया था और इस दौरान उन्होंने कई बार उससे सेक्स संबंध बनाए। जाहिर है प्रीति को फिल्मों में रोल नहीं मिला। यह मामला अभी अदालत में विचाराधीन है, पर यह तय है कि इस तरह के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, जिनमें लड़कियां किसी भी बहकावे में आकर लड़कों से शारीरिक संबंध बना लेती हैं और उसके बाद पछताती हैं।
डेट रेप ड्रगडेटिंग के बारे में तो आपने जरूर सुना होगा, लेकिन शायद डेट रेप ड्रग के बारे में ना सुना हो। भारतीय ड्रग एन्फोर्समेंट एजेंसी पिछले कुछ सालों से परेशान करने वाले एक ट्रैंड को नोट कर रही हैं। यह ट्रैंड है, गैर कानूनी ढंग से कैटेमाइन हाइड्रोक्लोराइड नामक ड्रग का निर्यात। कारण? यह ड्रग भारत में प्रतिबंधित नहीं है और यहां अच्छी गुणवत्ता वाला कैटेमाइन मिलती है। अब सवाल यह है कि इस ड्रग का क्या और कहां इस्तेमाल किया जाता है। मुख्य रूप से कैटेमाइन का प्रयोग रेव पार्टियों में किया जाता है। यह एक रंगहीन और बिना गंध वाला पदार्थ है, जिसका इस्तेमाल लड़के लड़कियों को बेहोश करने के लिए कर सकते हैं और कर रहे हैं। शरीर के भीतर पहुंचने के बाद लड़की कई घंटों तक होश में नहीं आती और बेहोशी की हालत में लड़के लड़की के साथ बलात्कार कर लेते हैं।
हैल्पलाइन्सदिल्ली महिला आयोग: 23379181, 23370597वुमन हैल्पलाइन: 1091 (24 घंटे टॉल फ्री), 23317002, 23317004, 23411091ट्रांसपोर्ट हैल्पलाइन: 9604-400-400
सुधांशु गुप्त
महंगी होती रिश्तों की डोर
पिछले दिनों बॉलीवुड में दो शादियां हुईं और दोनों ही अपनी-अपनी वजहों से आम जनता के बीच चर्चा का विषय बनीं। पहली शादी थी, बिग ब्रदर की विजेता और अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी की। शिल्पा ने एनआरआई राज कुंद्रा से कई सालों से चल रहे अफेयर को आखिर शादी में बदल लिया। राज कुंद्रा अप्रवासी भारतीय और करोड़पति हैं और अपनी पहली पत्नी से तलाक ले चुके हैं। शादी की जगह के रूप में रूमानियत के लिए जाने जाने वाले खंडाला को चुना गया। वहां बावा विला की सजावट देख कर किसी फेयरी टेल का-सा अहसास हो रहा था। पूरे लाल रंग में बावा विला को सजाया गया था-वेल्वेट, साटिन, गुलाब और खूबसूरत तरीके से सजाई गई मोमबत्तियां बता रही थीं कि यहां किसी राजकुमारी की शादी होने वाली है और शादी के मंडप को एक दक्षिण भारतीय मंदिर की तरह सजाया गया था। लेकिन आम जनता में जिन चीजों की ज्यादा चर्चा हुई वे थीं, शादी के मौके पर शिल्पा द्वारा पहने जाने वाला महंगा साड़ीनुमा लहंगा, लाखों रुपये का हीरों का हार, रिसेप्शन पर काटे जाने वाला 80 किलो का केक, (इस पर 9 परतों में क्रीम लगी थी) शैंपेन, इटैलियन, चाइनीज, इंडियन और कई देशों का भोजन। पूरा विवाह किसी स्वप्नलोक को साकार करता दिखाई पड़ रहा था। इन्हीं सब चीजों के बीच राज की साली ने जूता छिपाई की रस्म में पांच लाख रुपये की मांग की। हालांकि पहले वह 51 लाख रुपये की मांग करने वाली थीं। राज ने थोड़ी-बहुत नेगोसिएशन के बाद साली को खुशी-खुशी चार लाख रुपये दे दिये। दिलचस्प बात है कि इसी दिन दिल्ली के एक फॉर्म हाउस में होने वाली शादी में एक दूल्हे ने अपनी साली को जूता छिपाई की रस्म में सचमुच 51 लाख रुपये दिये। सालियों को दी गयी इन दोनों ही राशियों ने अचानक उन पुरुषों को हीन सा बना दिया, जो अपनी सालियों को 500, 1000 या 2100 रुपये देते हैं।
तीन बेटियों की 54 वर्षीया मां सरोजा देवी न जाने क्यों इस शादी को देख कर दुखी-सी हो रही थीं। उन्हें लग रहा था कि वे अपनी बेटियों की शादियों में कितना खर्च कर पायेंगी। उन्होंने कहा, टीवी पर शिल्पा की शादी की भव्यता को देख कर मुझे ऐसा लगा रहा था कि अकारण ही कोई मेरे ऊपर इस तरह का दबाव बना रहा है कि मुझे भी अपनी बेटियों की शादी में ज्यादा से ज्यादा तामझाम करना चाहिए। लेकिन एमबीए के बाद एक निजी कंपनी में नौकरी कर रही 25 वर्षीया हेमा इस शादी से बेहद एक्साइटिड थीं। उनका कहना था, इसमें बुरा क्या है? अगर मेरे बस में हुआ तो मैं भी इसी तरह की भव्य शादी करना चाहूंगी। लेकिन सभी लड़कियां इसी अंदाज में नहीं सोचतीं। वे शिल्पा के समानांतर हुई बॉलीवुड की एक अन्य शादी को उदाहरण मानती हैं। इसमें ईशा कोप्पिकर और व्यवसायी टिमी नारंग ने जुहू के इस्कॉन मंदिर में बेहद सादगी के साथ विवाह किया। इस समारोह में परिवार के कुछ लोग ही शामिल हुए। दिलचस्प बात यह रही कि मीडिया ने भी शिल्पा की शादी को प्रमुखता देते हुए उसे ज्यादा कवरेज दी। तर्क वही हो सकता है कि शिल्पा की शादी के विजुअल ज्यादा आकर्षक थे। वहीं ईशा की शादी को ज्यादा तरजीह नहीं दी गयी।
बेशक आम जनमानस ने भी शिल्पा की शादी में ज्यादा रुचि ली हो, लेकिन व्यवहार में वह इसे सही नहीं मानता। मध्यवर्गीय 45 वर्षीया मधु के दो बच्चों हैं एक बेटा, एक बेटी। लेकिन उनका साफ मानना है कि इस तरह के दिखावे का समाज पर गलत असर पड़ता है। वह थोड़ी गंभीर होकर कहती हैं, हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहां आज भी लाखों लोग केवल एक ही वक्त का भोजन कर पाते हैं। ऐसे में इस तरह के दिखावे का कोई अर्थ नहीं है। ऐसा कतई नहीं है कि उम्रदराज महिलाएं ही ऐसा सोचती हैं। युवा लड़कियां भी इस तरह के दिखावे में यकीन नहीं रखतीं। एमबीए कर चुकी नेहा का कहना है, शादी में इतना शो ऑफ नहीं करना चाहिए। यदि आपके पास बहुत ज्यादा पैसा है तो आप चैरिटी कर सकते हैं। मुझे लगता है कि इस तरह की शादियों के पीछे प्रचार की भावना ही अधिक होती है। कमोबेश यही सोच मार्केटिंग की पढ़ाई के बाद एक अखबार में काम कर रही 23 वर्षीया मानसी की है। वह कहती हैं, शादी जीवन में एक बार होती है, इसलिए इसे यादगार तो बनाना चाहिए, लेकिन अनावश्यक पैसे खर्च करने का कोई मतलब नहीं होता।
हालांकि मध्यवर्ग में दिखावे की परंपरा हमेशा से रही है और हर व्यक्ति बेटी या बेटे की शादी में अपनी क्षमताओं से ज्यादा खर्च करता है। उसका अधिकांश ध्यान इस बात पर रहता है कि लोग ये ना कहें कि शादी में कमी रह गयी। ऐसे में शिल्पा शेट्टी जैसी सिलेब्रेटीज की भव्य शादियां उन्हें और दिखावे के लिए प्रेरित करेंगी। ऐसा भी नहीं है कि सभी सिलेब्रेटीज इसी भव्यता के साथ शादी करती हैं। अजय देवगन और काजोल ने दस साल पहले बेहद सादगी से विवाह किया था और उसमें अजय और काजोल के बहुत करीब लोगों ने ही शिरकत की थी। और हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यह भव्यता और तामझाम कुछ ही समय का होता है। अहम बात यह है कि आप अपने रिश्ते को कितनी गंभीरता से लेते हैं। लोग यह भूल जाते हैं कि राज कुंद्रा की पहली शादी भी इसी भव्यता से हुई होगी। लिहाजा हमें भव्यता से ज्यादा रिश्ते की अहमियत को समझना चाहिए-खासतौर पर एक देश में जहां सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के सहयोग से लाखों शादियां सामुदायिक स्तर पर होती हैं।
बॉलीवुड की सिलेब्रिटीज, जिन्हें आम आदमी अपना रोल मॉडल मानता है, यदि इस दिशा में पहल करेंगी तो लोग उनका अनुसरण करना चाहेंगे, अन्यथा इस तरह की भव्य शादियां जहां एक ओर बिजनेस क्लास में एक होड़ सी पैदा कर देती हैं, वहीं दूसरी ओर ये मध्यवर्गीय परिवारों के माता-पिताओं पर एक अनदेखा सा दबाव भी बनाती हैं कि उन्हें भी अपनी बेटियों की शादियों में भरपूर तामझाम करना चाहिए।
मुझे मौका मिला और मेरे पास इतनी सुविधाएं हुईं तो मैं भी भव्य शादी करना चाहूंगी, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि मैं लोगों से उधार मांग कर इतनी भव्य शादी करूंगी।- हेमलता, 25 वर्ष
हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहां आज भी करोड़ों लोग एक समय का भोजन करते हैं, ऐसे में कोई अपनी शादी पर करोड़ों रुपया कैसे खर्च कर सकता है। आज महंगी शादियां करने की होड़ सी मची हुई है।- मधु गर्ग, 45 वर्ष
शादी में इतना शो ऑफ कभी नहीं करना चाहिए। अगर आपके पास इतना अधिक पैसा है तो आप चैरिटी कर सकते हैं। मैं अपनी शादी में इतना दिखावा पसंद नहीं करूंगी। ऐसी शादियां प्रचार के लिए की जाती हैं।- नेहा, 24 वर्ष
शादी पर बहुत ज्यादा शो ऑफ नहीं करना चाहिए, लेकिन क्योंकि शादी जीवन में एक ही बार होती है, इसलिए यादगार जरूर होनी चाहिए। पर फालतू चीजों पर ज्यादा खर्च करना मुझे अच्छा नहीं लगता।- मानसी, 23 वर्ष
शिल्पा की शादी में जिस तरह से बेपनाह खर्चा हुआ, उससे हमारे जैसे मध्यवर्गीय लोग भी हीन महसूस करने लगते हैं। जिनकी ज्यादा बेटियां हैं, उनके लिए तो इस तरह की शादी की कल्पना ही बेमानी है।- सरोजा देवी, 54 वर्षं
सुधांशु गुप्त
हनी हनी सा हनीमून
भारत में हिल स्टेशन का जबरदस्त क्रेज है और हनीमून के लिए तो व्यक्ति सबसे पहले हिल स्टेशन पर ही उंगली रखता है। जब हिल स्टेशंस की बात आती है तो शिमला, मनाली, कुल्लू, नैनीताल, मसूरी, माउंट आबू, श्रीनगर, गंगटोक, दार्जिलिंग का नाम जेहन में उभरता है। यदि आप बर्फीले मौसम में एक दूसरे के अधिक से अधिक करीब रहना चाहते हैं तो हिल स्टेशन आपके लिए बेहतरीन विकल्प हो सकता है। इस बार आप भी योजना बना रहे हैं तो परंपरागत हिल स्टेशंस को एकदम भूल जाइये। श्रीनगर का चुनाव करना भी यादगार साबित हो सकता है। श्रीनगर हमेशा से ही दुनिया भर के पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। श्रीनगर को लवर्स पैराडाइज माना जाता है। यहां के खूबसूरत लैंडस्केप में ही कुछ ऐसा है, जो आपको अपने प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए बाध्य कर देता है। आपकी सारी झिझक दूर हो जाती है और आप खुद को अपने पार्टनर के और भी ज्यादा करीब पाते हैं। आपके भीतर की रूमानियत बरबस बाहर निकल आती है। लिहाजा श्रीनगर शादियों और हनीमून के इस मौसम में श्रेष्ठ डेस्टिनेशन साबित हो सकता है, अन्यथा बाकी हिल स्टेशन तो हैं ही।
समुद्र तटों का मोहयदि पानी आपको आकर्षित करता है और पानी की लहरों पर खेलती सूरज की रोशनी आपके भीतर रोमांच का अहसास कराती है तो यकीन जानिए समुद्र-तट आपकी हनीमून मंजिल है। और जब बात बीचेज की होती है तो सबसे पहले बीच कैपिटल गोवा याद आता है। गोवा के समुद्री तट केवल हनीमून पर्यटकों को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यहां आपको रूमानियत अपने पूरे शबाब पर देखने को मिलती है और आप खुद-ब-खुद रोमांस को मचलने लगते हैं। कहते हैं कि कश्मीर के बाद यदि कहीं जन्नत है तो वह गोवा में ही है। गोवा के अलावा केरल और आंध्र प्रदेश के समुद्र तट भी पर्यटकों की पसंद रहे हैं। लेकिन यदि आप थोड़े एकांत और अलग मिजाज के हैं तो आपको हनीमून के लिए लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार को अपना डेस्टिनेशन बनाना चाहिए। लक्षद्वीप यूं भी एक ऐसा पर्यटन स्थल रहा है, जहां पर्यटकों की ज्यादा निगाह नहीं पड़ी है। यहां का फैलाव लिए हुए समुद्र अपनी अलग-अलग प्रकृति में दिखाई पड़ता है। देर शाम ऐसा लगता है कि समुद्र बादलों की चादर ओढम् कर सोया है। यही मिजाज अंडमान निकोबार आइलैंड का है। यदि आप प्रयोगधर्मी हैं और रुटीन चीजें आपको नापसंद हैं तो अपने हनीमून को यादगार बनाने के लिए यह उपयुक्त जगह है। यहां की वर्जिन ब्यूटी आपके जेहन में इस तरह हावी हो जाएगी कि आप इस लम्हे को भूल नहीं पायेंगे।
केरल के जलमार्ग यदि पानी से आपको प्यार है, लेकिन आपका मिजाज समुद्र तटों को पसंद नहीं करता तो निश्चित तौर पर केरल के जलमार्ग आपके हनीमून के गवाह बन सकते हैं। जलमार्ग का अर्थ है, जब समुद्र केरल में प्रवेश करता है तो वह एक हिस्से को काटता हुआ गुजरता है। और जिस हिस्से को काटता है, उस हिस्से से दूर समुद्र का पानी दिखाई पड़ता है। इन्हें बैकवॉटर्स ब्यूटी भी कहा जाता है। दिलचस्प रूप से केरल में समुद्र ने ऐसे कई जलमार्ग बनाए हुए हैं। इनमें अलप्पुझा, कोचिन, तिरुवनंतपुरम, तिरुवल्लम, कुमारकोम, कोट्टायम और कसारगौड़ प्रमुख हैं। मजेदार बात है कि जब आप जलमार्ग की ओर बढ़ते हैं तो एक से एक खूबसूरत दृश्य आपकी आंखों में बस से जाते हैं। यहां आप खुद को भी प्रकृति का ही एक हिस्सा मानने लग जाते हैं और तरोताजा महसूस करते हैं-यह ताजगी आपके रिश्तों में उम्र भर बनी रहती है। इतिहास प्रेम यदि आपकी स्मृतियों में इतिहास कौंधता है, किले और महल आपको आकर्षित करते हैं, समृद्ध वास्तुकला आपके सौंदर्यबोध को बढमती है तो राजस्थान हनीमून के लिए एक ऐसा ही डेस्टिनेशन है। यहां मनाया गया हनीमून इतिहास की तरह आपकी स्मृतियों में दर्ज हो जाएगा, जिसे आप उम्र भर संजो कर रखना चाहते हैं। राजस्थान की हवेलियां, किले और इतिहास को दर्शाती इमारतें यक-ब-यक आपको भी शाही-सा बना देंगी। आप कभी भी इस हनीमून को भूल नहीं पायेंगे। खासकर इसलिए भी, क्योंकि अब इसके साथ इतिहास की स्मृतियां भी जुड़ी हैं।
सुधांशु गुप्त
आहत होते अतिथि
भारत में लंबे अरसे तक अतिथि देवो भव की परंपरा रही है, जिसका अर्थ है कि यहां मेहमानों को भगवान का दर्जा दिया गया है। इस दृष्टि से यहां आने वाले पर्यटक भी हमारे लिए भगवान ही होने चाहिए, लेकिन पिछले कुछ वर्षो में जिस तरह महिला विदेशी पर्यटकों के साथ बलात्कार की घटनाओं में इजाफा हो रहा है, उससे तो यही लगता है कि हमने अतिथि देवो भव की अपनी परंपरा को बिसरा दिया है। क्या है विदेशी महिलाओं के साथ होने वाले इन बलात्कारों के सामाजिक, आर्थिक और आधुनिक सच?
अखबारों में अब आए दिन विदेशी पर्यटकों के साथ होने वाले बलात्कार और बदतमीजियों की खबरें प्रकाशित होती रहती हैं। हम खबरों को रूटीन अंदाज में पढ़ते हैं और ये जानने की कोशिश नहीं करते कि इस तरह की खबरें भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को किस कदर नुकसान पहुंचा रही हैं। एक नियोजित सा शोर किसी बलात्कार के बाद उठता है और वह कुछ ही रोज में शांत हो जाता है-मानो कहीं कुछ हुआ ही नहीं। और कुछ दिन बाद फिर किसी विदेशी महिला को बलात्कारी का शिकार बनना पड़ता है।
हाल ही में राजधानी दिल्ली में दुबई मूल की महिला ने आरोप लगाया है कि 5 नवंबर को आगरा से लौटते हुए सराय काले खां के पास कैब के ड्राइवर ने चाकू की नोक पर उससे दुष्कर्म किया। हालांकि महिला ने मेडिकल जांच कराने से इंकार कर दिया, लेकिन पुलिस ने दुष्कर्म के प्रयास का मामला दर्ज कर लिया है। यह भी हममें से किसी से छिपा नहीं है कि दर्ज किए गए मामलों का क्या होता है। इनमें से अधिकांश मामलों में सुबूतों और गवाहों के न होने के चलते अपराधी बच जाते हैं या फिर वह पर्यटक विदेशी महिला होने के कारण केस को ज्यादा लंबे समय तक खींच नहीं पाती और अपराधी खुलेआम छुट्टे घूमते रहते हैं।
अगर यह देखें कि विदेशी महिलाओं से बलात्कार के ज्यादातर मामले कहां होते हैं तो हमें पता चलता है कि भारत के लोकप्रिय माने-जाने वाले पर्यटन स्थल ही इस तरह की शर्मनाक घटनाओं के सबसे ज्यादा गवाह बनते हैं। गोवा, मनाली, राजस्थान, पुष्कर, आगरा, दिल्ली और केरल इस मामले में सबसे आगे कहे जा सकते हैं। विडंबना यह है कि किसी भी विदेशी महिला से बलात्कार की घटना के बाद जो तर्क और सफाइयां दी जाती हैं, वे बेहद बचकानी लगती हैं।
मिसाल के तौर पर पिछले साल गोवा में हुए एक बलात्कार के बाद वहां के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस ने कहा था, मैं निश्चित रूप से इस घटना को गलत कहूंगा, लेकिन साथ ही मैं यह भी कहूंगा कि यह कोई ट्रैंड नहीं है। वहां के स्थानीय अधिकारियों का तर्क था कि बलात्कार की घटनाओं में वृद्घि का मूल बढ़ती पर्यटकों की संख्या में छिपा है। गौरतलब है कि गोवा के खूबसूरत समुद्री तट विदेशी पर्यटकों को सबसे ज्यादा आकर्षित करते हैं। कमोबेश यही बात आगरा और राजस्थान के बारे में कही जा सकती है। आंकड़े बताते हैं कि यहां आने वाले हर तीन विदेशी पर्यटकों में से एक राजस्थान जरूर जाता है, लेकिन यह तर्क भी गले नहीं उतरता, क्योंकि अगर ऐसा ही है तो प्रशासन टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए इतने प्रयास क्यों कर रहा है। मूल प्रश्न यही है कि ‘अतिथि देवो भव’ की हमारी खूबसूरत परंपरा किस तरह अतिथि को आहत करने की शर्मनाक परंपरा में तब्दील होती जा रही है? इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले दो दशकों में भारत का पर्यटन उद्योग तेजी से बढ़ा है। आंकड़े बताते हैं कि गोवा में 2007 तक 22 लाख विदेशी पर्यटक आ रहे थे और इनकी संख्या हर वर्ष बढ़ रही है। इसी तरह आगरा में हर साल दस लाख से अधिक विदेशी पर्यटक आते हैं। हिमाचल प्रदेश में विदेशी पर्यटकों की संख्या पिछले पांच वर्षों में तीन गुणा बढ़ी है। केंद्र, राज्य सरकारें और इंडियन टूरिज्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (आईटीडीसी) लगातार इस बात के प्रयास कर रहे हैं कि पर्यटन उद्योग को तीव्र गति से बढ़ाया जाए, लेकिन इसके समानांतर विदेशी पर्यटकों-खासतौर पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए कोई उचित प्रबंध नहीं किए गए। पिछल वर्ष दिल्ली में सभी राज्यों के पर्यटन मंत्रियों की एक बैठक बुलाई गई थी और उनसे कहा गया था कि सभी महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थलों पर टूरिस्ट पुलिस की व्यवस्था की जाए, लेकिन केवल दस राज्यों ने ऐसा किया। जाहिर है, पर्यटकों की सुरक्षा एक अहम मुद्दा है, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि पर्यटकों को हर जगह तो सुरक्षा नहीं दी जा सकती। विदेशी महिलाओं के साथ इस तरह की घटनाएं न हों, इसके लिए जरूरी है मानसिकता का बदलना और उन कारणों को दूर करना, जो बलात्कार की मानसिकता को जन्म देते हैं। वे कारण क्या हैं?
भारत में साक्षरता दर बढ़ रही है, लोग समृद्घ हो रहे हैं, वैश्विक हो रहे हैं और भारत में पश्चिमी मूल्य आ रहे हैं। लेकिन साथ ही पारिवारिक मूल्य टूट रहे हैं और महिलाएं अपने ही घर में सुरक्षित नहीं रही हैं। बॉलीवुड फिल्मों में और विज्ञापनों में महिलाओं को लगातार एक सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में पेश किया जा रहा है। इसके साथ ही पोर्न उद्योग भी अपना आकार बढ़ा रहा है। सैटेलाइट चैनल्स पर किसी तरह की कोई बंदिशें नहीं हैं। इनमें नग्नता को फैशन ट्रैंड और उच्च जीवन शैली के प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा है। इसने जाहिर तौर पर महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में इजाफा किया है। यह अकारण नहीं है कि हमारे देश में हर बीस सेकेंड के बाद कहीं न कहीं किसी न किसी लड़की के साथ बलात्कार होता है। ऐसे में बलात्कार करने वाला यह नहीं देखता कि वह विदेशी के साथ बलात्कार कर रहा है या भारतीय के साथ।
चर्चित मानव व्यवहारवादी विदेशी महिलाओं के साथ बलात्कार के पीछे एक और कारण देखते हैं। उनका कहना है, पुरुष काले रंग की बजाय गोरे रंग को प्राथमिकता देते हैं। वह आगे कहते हैं कि अगर कोई इस बात को परखना चाहे तो वह वैवाहिक विज्ञापनों को देख सकता है, जिसमें पुरुष गोरी लड़कियों को पत्नी बनाने के पक्ष में दिखाई देते हैं।
कारण चाहे कुछ भी हों, लेकिन ये घटनाएं निहायत शर्मनाक हैं। फिल्म स्टार आमिर खान भी इनको लेकर चिंतित हैं। उन्होंने राकेश ओमप्रकाश मेहरा के साथ मिल कर एक लघु फिल्म की है, जिसमें विदेशी पर्यटकों को भारत आने के लिए आमंत्रित किया गया है और यह दिखाने की कोशिश की गई है कि भारत में आज भी अतिथि को देवता माना जाता है। लेकिन क्या इस सबसे विदेशी महिलाओं के साथ होने वाले अपराध रुक जाएंगे? शायद नहीं। उसके लिए हमें अपनी मानसिकता को बदलना होगा, अन्यथा देव भूमि पर अतिथि इसी तरह आहत होते रहेंगे।
सुधांशु गुप्त
डिवोर्स टूरिज्म: चलो कहीं घूमने चलें
नयी अवधारणा को जन्म दिया है-डिवोर्स टूरिज्म। पश्चिमी मुंबई की केवी टूर्स एंड ट्रैवल नामक एक कंपनी ने डिवोर्स टूरिज्म पैकेज की घोषणा की है। आखिर ये पैकेज है क्या? इस कंपनी के मुख्य एग्जीक्यूटिव ऑफिसर विजेश ठक्कर ने फोन पर बताया, हम लोग उन लोगों को एक पैकेज दे रहे हैं, जिनके बीच में प्रेम समाप्त हो चुका है और जो तलाक लेना चाहते हैं। यह पैकेज इस तरह से डिजाइन किया गया है, ताकि हम तलाक लेने वाले पति-पत्नी को दोबारा एक साथ ला सकें। उन्हें उस महानगरीय माहौल से कुछ दिन के लिए बाहर निकाल सकें, जहां वे रूटीन जीवन के चलते तलाक लेने की स्थिति में आ पहुंचे हैं। बकौल ठक्कर, हालांकि यह आसान काम नहीं है, लेकिन हम पहले अपने काउंसलर के जरिये उन्हें इस बात के लिए राजी करते हैं कि वे हमारे साथ पर्यटन के लिए चलें। इस पैकेज के दौरान हम लगातार उनकी काउंसलिंग करते रहेंगे और उन्हें प्रेम के वे क्षण याद दिलाने की कोशिश करते रहेंगे, जो कभी उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी दौलत थी।
केवी टूर्स एंड ट्रैवल्स को इस कॉन्सेप्ट को बाजार में उतारे अभी मुश्किल से दो माह का ही समय हुआ है और इस दौरान इस पैकेज को लेने के लिए 12 से भी अधिक कपल्स तैयार हो चुके हैं। बकौल ठक्कर, यह पैकेज लेने वालों में महाराष्ट्र, मुंबई, दुबई और पाकिस्तान तक के कपल्स हैं। इस टूर पैकेज का इनके जीवन पर क्या असर पड़ता है, यह तो आने वाला समय ही बतायेगा, लेकिन इतना तय है कि पर्यटन उद्योग में हैल्थ टूरिज्म, फैशन टूरिज्म और बॉलीवुड टूरिज्म के बाद डिवोर्स टूरिज्म नामक एक नयी अवधारणा जुड़ गयी है। हालांकि दिल्ली का पर्यटन उद्योग इस तरह की अवधारणा पर कोई काम नहीं कर रहा, लेकिन वह जनता है कि यूरोपियन देशों में डिवोर्स टूरिज्म खासा लोकप्रिय है। वहां इसकी लोकप्रियता इसलिए भी बहुत ज्यादा है, क्योंकि वहां तलाक दर भारत के मुकाबले बहुत ज्यादा है। आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में ही हर दो शादियों में से एक का अंत तलाक के रूप में होता है, जबकि भारत में हर 100 शादियों में से महज 1.1 शादी ही तलाक तक पहुंचती है।
यही वजह है कि अभी डिवोर्स टूरिज्म की अवधारणा को स्वीकार करने में लोगों को दिक्कत हो सकती है, लेकिन यदि तलाक के मामले इसी तरह बढ़ते रहे तो इसमें कोई शक नहीं कि डिवोर्स टूरिज्म आने वाले समय में लोकप्रियता हासिल कर सकता है। दिल्ली में, स्टिक ट्रैवल्स प्राइवेट लि. की ईषा गोयल का कहना है, भारत में अभी भी लोग इस तरह के निजी मामलों में बहुत ज्यादा खुले नहीं हैं, इसलिए वे इस टूरिज्म को कितना अपना पायेंगे, नहीं कहा जा सकता। लेकिन उनका यह भी कहना है कि हमारे समाज में खुलापन आ रहा है और लोग तलाक जैसे मुद्दों पर भी दूसरों से चर्चा करने लगे हैं। और यदि इस तरह के टूरिज्म से सचमुच लोगों का वैवाहिक जीवन बच सका तो यह बहुत ज्यादा लोकप्रिय हो सकता है।
यह पैकेज इस तरह से डिजाइन किया गया है, ताकि तलाक लेने वाले पति-पत्नी को दोबारा एक साथ लाया जा सके। उन्हें उस महानगरीय माहौल से कुछ दिन के लिए बाहर निकाला जा सके, जहां वे रूटीन जीवन के चलते तलाक लेने की स्थिति में आ पहुंचे हैं।
तमाम कारणों के चलते देश में तलाक के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। हालांकि विदेशों में होने वाले तलाक के मुकाबले इनकी संख्या बेहद कम है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया ज सकता कि तलाक अब पहले की तरह ऐसा विचार नहीं रहा, जिसके बारे में लोग बातचीत करने से भी कतराते हों। लिहाज महानगरों में तो तलाक के मामलों में वृद्धि हो ही रही है। ऐसे में बाजार ने डिवोर्स टूरिज्म नामक एक अवधारणा को जन्म दिया है।
भारत में हर 100 शादियों में से महज 1.1 शादी ही तलाक तक पहुंचती है
तलाक के मुकदमे दायर करने वालों में 70% की उम्र 25-35 साल के बीच है यानी तलाक दायर करने वाले नयी पीढ़ी और नये मूल्यों के लोग हैं।
अमेरिका में हर दो शादियों में से एक का अंत तलाक के रूप में होता है।
सुधांशु गुप्त
एडवेंचर: स्क्रीन से जिंदगी तक
12वीं क्लास में पढ़ने वाला सुमित बड़े गर्व से बताता है कि वह बहुत ज्यादा एडवेंचरस है। क्यों? इसके जवाब में वह कहता है कि उसे छोटे परदे पर खतरों के खिलाड़ी, डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफिक चैनल, एनिमल प्लेनेट के एडवेंचर से जुड़े प्रोग्राम देखना बहुत अच्छा लगता है। इसके अलावा वह कई बार ट्रैकिंग पर भी ज चुका है। सुमित द्वारा कही गई यह बात वास्तव में भारतीय समाज के एडवेंचरस होने की ओर इशारा करती है। आमतौर पर बातचीत में हम सभी लोग एडवेंचर के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं। हम कहते हैं कि एडवेंचरस होना बहुत अच्छी बात है। इस बात के पक्ष में हम उन लोगों के नाम गिनवाना भी नहीं भूलते, जो ट्रैकिंग, पैराग्लाइडिंग, स्काईडाइविंग, बेसजंपिंग, सर्फिग और माउंटेनियरिंग में अव्वल आते है। कोई शक नहीं कि एडवेंचरस होना वास्तव में बहादुर होना होता है। इसीलिए लोग खुद को एडवेंचरस कहने का कोई मौका हाथ से जाने देना नहीं चाहते।
एडवेंचर है क्या? एडवेंचर यानी रोमांच का सीधा-सा अर्थ है, जब आप रुटीन लाइफ को तोड़कर कोई अलग काम करते हैं। मजेदार बात है कि एडवेंचर के बारे में हर आदमी का अपना अलग नजरिया है। मुंबई में रहने वाले दिलीप कुमार का कहना है कि मैं मूल रूप से मुंबई का नहीं हूं, लेकिन मुझे लगता है कि मुंबई की लोकल ट्रेनों में सफर करना किसी एडवेंचर से कम नहीं है। कमोबेश इसी तर्ज पर महानगर दिल्ली का युवा सोचता है। उसका कहना है कि यहां ब्लू लाइन और डीटीसी की बसों में सफर करना किसी एडवेंचर से कम नहीं है। लेकिन इन तमाम चीजों को तो एडवेंचर नहीं कहा जा सकता। सच तो यही है कि एडवेंचरस लाइफ के तमाम ढंग हैं, जिनकी लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।
जिन लोगों के पास वास्तविक एडवेंचर की सुविधाएं नहीं हैं, वे मोबाइल, कंप्यूटर या वीडियो गेम का सहारा लेते हैं, अन्यथा टीवी पर ‘खतरों के खिलाड़ी’, ‘इस जंगल से मुङो बचाओ’ जसे कार्यक्रमों से चिपके रहते हैं। भारत में टेलीविजन और कंप्यूटर के प्रचार-प्रसार से जीवनशैली में एडवेंचर को खास स्थान मिलने लगा है। मोबाइल ने तो इस मामले में क्रांति ही ला दी है। इन सभी माध्यमों से लोगों को खेलों के माध्यम से ही सही, कुछ ऐसा करने का मौका मिलता है, जो एडवेंचर में उनकी रुचि का परिचायक है। यदि कंप्यूटर, मोबाइल आदि पर गेम्स की बात करें तो नि:संदेह सबसे अधिक लोकप्रियता एक्शन गेम्स की ही है। क्या बच्चे, क्या बड़े, सभी इसके दीवाने हैं। यों अगर देखा जाए तो जिस देश में एक-तिहाई आबादी गरीब और आधी आबादी निरक्षर है, उनके लिए वास्तविक रूप से एडवेंचरस होना आसान नहीं था। लेकिन वैश्वीकरण, उदारीकरण और तकनोलॉजी के विकास ने स्क्रीन पर भी इंसान को एडवेंचरस बनाया है।
भारत में रहने वाले कुल 22 करोड़ बच्चों (5 से 16) में से 7 करोड़ 70 लाख बच्चे स्कूल जाते हैं। लेकिन टाइमपास करने का इनका पसंदीदा तरीका टीवी देखना या वीडियो गेम्स खेलना है। आंकड़े बताते हैं कि पांच से सोलह वर्ष की उम्र के बच्चे तीन से चार घंटे प्रतिदिन टीवी देखते हैं। ऐसे किशोरों की संख्या भी अब लगातार बढ़ रही है, जो कम्प्यूटर और मोबाइल की स्क्रीन पर रोमांच का भरपूर मज लेते हैं। महानगरों में नौकरीपेशा लोग भी ऐसे ऑनलाइन गेम्स के माध्यम से खुद को तरोताज करते हैं। इसके अलावा एडवेंचरस फिल्में तो हैं ही। तात्पर्य यह कि गैजेट्स ने इंसानों को खेल-खेल में एडवेंचर का लुत्फ लेने के भरपूर मौके दिए हैं।
तो क्या वास्तविक एडवेंचर में लोगों की दिलचस्पी कम है? नहीं, ऐसा नहीं है। यह सच है कि चाहे ट्रैकिंग हो, पैराग्लाइडिंग या सर्फिग हो, या फिर कोई अन्य ही एडवेंचरस गेम क्यों न हो, इसके मौके सबको नहीं मिलते, क्योंकि हर जगह ये उपलब्ध नहीं हैं। फिर भी जो ऐसे गेम, ऐसी जिंदगी पसंद करते हैं, वे ऐसे माहौल को तलाश ही लेते हैं। एडवेंचर के किस्सों से इतिहास भरा पड़ा है, पर उनका अनुकरण करना न तो आसान है और न ही आम आदमी को इसकी जरूरत है। इस संदर्भ में लंदन के एक छात्र का उदाहरण देना अप्रासंगिक नहीं होगा। 30 वर्षीय यह छात्र लंदन में किसी विषय में पढ़ाई कर रहा था। एक रोज उसने चिड़ियाघर में फरडिलॉन नामक एक सांप देखा। वह उस सांप से बेहद प्रभावित हुआ। उसने पता किया तो पता चला कि फरडिलॉन दक्षिणी अमेरिका के बैलीज देश में पाया जाता है। उसने फरडिलॉन पर रिसर्च करने के लिए लंदन का अपना मकान बेचा और बैलीज चला गया। पर ऐसा एडवेंचर भला सबके लिए कैसे संभव हो सकता है।
सच तो यह है कि यहां एडवेंचर का अर्थ गेम, आनंद या फिर किसी सामाजिक सरोकार से है, जिसके तहत कुछ ऐसा किया जए, जिसमें मज आए और साथ ही आपका साहस भी उसमें नजर आए। इस दृष्टिकोण से देखा जए तो लोग वास्तव में एडवेंचरस होने लगे हैं। ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो कार से ही कन्याकुमारी से कश्मीर घूमने का दम रखते हैं या ठंड के दिनों में भी कश्मीर जने का हौसला रखते हैं। और ऐसे कार्यक्रम हर साल उनकी जीवनशली का हिस्सा बनते हैं। एडवेंचरस गेम्स के लिए बनी विभिन्न संस्थाएं भी इस मामले में लोगों की बेहद मददगार साबित हो रही हैं।
सुधांशु गुप्त
Saturday, June 5, 2010
शादियों का मौसम और बदलते रुझान
ये शादियों का मौसम है-अपना पार्टनर ढूंढ़ने का मौसम। भारत में इस मौसम में जितनी शादियां होती हैं, उतनी शायद ही किसी और मौसम में होती होंगी। इसलिये यह सही मौका हो सकता है, जब हम युवाओं की बदलती प्राथमिकताओं पर एक नजर डालें और यह जानने की कोशिश करें कि वैश्वीकरण, आर्थिक उदारीकरण और तकनालॉजी के विकास के इस दौर में अपना पार्टनर चुनने को लेकर इनसानी सोच में क्या बदलाव आए हैं। लेकिन इससे पहले यह जनना भी बेहद जरूरी है कि इन बदलावों से पहले जो जोड़ियां बनती थीं, उनकी क्या प्राथमिकताएं थीं। यदि तीन दशक पहले के ववाहिक मौसम को याद करें तो जो तस्वीर दिखाई पड़ती है, उसमें लड़के चाहते थे कि उनकी भावी जीवन संगिनी सुंदर हो, उसका रंग गोरा हो, पढ़ी-लिखी हो (बेशक बहुत ज्यादा नहीं) और घरेलू कामकाज में दक्ष हो, सलीके से घर को संभाल सके। और लड़कियां अपने भावी राजकुमार का जो सपना देखती थीं (हालांकि उनके सपनों की डोर भी मां-बाप के ही हाथ में थी)उसमें लड़के का ठीकठाक होना और नौकरीपेशा होना ही अहम बात थी। लेकिन अब संसार बदल गया है, बदल रहा है। अब विवाह को लेकर लड़कियों के अपने सपने हैं और लड़कों के अपने। ऐसा नहीं है कि मां-बाप ने अपने बच्चों की शादियों को लेकर सपने देखने बंद कर दिये हैं। लेकिन अब मांबाप यह कोशिश कर रहे हैं कि वे अपने बच्चों के सपनों को ही अपना सपना बना सकें।
हाल ही में शादी.कॉम नामक एक वेबसाइट ने इस संदर्भ में एक सव्रे किया और उसके दिलचस्प नतीजे सामने आये। बेशक इस दौरान दुनिया बहुत बदली, लेकिन जो चीज नहीं बदली, वह थी गोरे रंग के प्रति लोगों का आकर्षण यानी विवाह के बाजार में आज भी गोरे रंग की काफी मांग है। सव्रे की रिपोर्ट बताती है कि 49 फीसदी लोग आज भी गोरे रंग के पार्टनर को पसंद करते हैं, जबकि 42 फीसदी लोगों के लिए रंग कोई महत्व नहीं रखता। जिस राज्य के सबसे ज्यादा लोग गोरे रंग पर फिदा होते हैं, वह है राजस्थान। जबकि गुजरात ऐसा राज्य है, जहां पुरुषों के लिए रंग सबसे कम अर्थ रखता है। और महाराष्ट्र में सबसे कम लड़कियां गोरे रंग के पुरुषों को पसंद करती हैं।
प्रेम ना देखे जातएक समय था, जब हमारे यहां शादियों में सबसे पहले इनसान की जाति देखी जाती थी (गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में अब भी जाति ही सर्वोच्च प्राथमिकता पर है), लेकिन महानगरों में रहने वाली युवा पीढ़ी ने शादियों के मामले में जाति की प्राथमिकता को अब पीछे छोड़ दिया है। निजी तौर पर युवाओं के लिए जाति अब बहुत ज्यादा मैटर नहीं करती। सव्रे की रिपोर्ट बताती है कि लगभग 52 फीसदी लड़कों और 48 फीसदी लड़कियों के लिए अब जति ज्यादा अहमियत नहीं रखती। हालांकि अभिभावकों के लिए यह बात उतनी सही नहीं है। 38 फीसदी लड़के के माता-पिता और 47 फीसदी लड़की के माता-पिता अभी भी विवाह के लिए जाति को अहमियत देते हैं। लेकिन दिलचस्प रूप से राजधानी दिल्ली को जाति के मामले में सबसे उदार पाया गया। और केरल, जहां साक्षरता सौ फीसदी है, ऐसा राज्य पाया गया, जहां लोग अपनी ही जति में विवाह करना पसंद करते हैं।
कुंडली नहीं, योग्यता को महत्वसर्वे के अनुसार, कुंडली मिलाने की परंपरा भी अब बासी पड़ती दिखाई दे रही है। युवाओं का मानना है कि अब कुंडली मिलाने से अच्छा है कि हम अपने पार्टनर के गुण-दोष देखें। दिलचस्प रूप से लोगों ने कुंडली मिलाने की बजाय योग्यता पर ज्यादा बल देने का समर्थन किया। हां, 24 फीसदी लोग कुंडलियों के पक्ष में थे। परंपराओं के पोषक इन लोगों का मानना है कि वे किसी भी व्यक्ति से शादी करने से पहले कुंडलियों का मिलान अवश्य करेंगे, ताकि भविष्य में उनकी शादी को कोई खतरा न हो।
पार्टनर को जानने की चाहतपहले की तरह अब लड़कियां किसी भी अनदेखे व्यक्ति से विवाह करने को तैयार नहीं हैं। वह चाहती हैं कि शादी से पहले वे अपने होने वाले पति को जानें और समङों। यदि वह अनुकूल पाया जाए, तभी उससे शादी की जाए। लड़कियों की दृष्टि से यह एक बहुत बड़ा बदलाव है और यह बदलाव यह संकेत दे रहा है कि लड़कियों की दुनिया अब बदलने लगी है। सर्वे के आंकड़े भी इसी बात की गवाही देते हैं। आंकड़ों के अनुसार, 88 फीसदी लड़कियां चाहती हैं कि वे अपने भावी पति को विवाह से पहले ही अच्छी तरह जानें और समङों, जबकि 73 फीसदी लड़के इस बात के पक्ष में हैं कि विवाह से पहले उन्हें अपनी जीवन संगिनी को अच्छी तरह जनना और समझना चाहिए। लड़के के मां-बाप भी इस बात के समर्थन में हैं कि उनके बेटे को शादी से पहले लड़की को अच्छी तरह जानना चाहिए। 40 फीसदी लड़के ऐसा पाये गये, जो अपनी पार्टनर के साथ शादी से पहले समय बिताने के पक्षधर थे और 42 फीसदी लड़कियों ने माना कि अपने पार्टनर को जानने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उसके साथ अधिक से अधिक समय बिताया जाए। यह इशारा है कि आज की युवा पीढ़ी प्रेम विवाह की पक्षधर है।
प्रोफेशन अब भी अहमियत रखता हैएक लंबे समय तक विवाह के बाजार में डॉक्टरों और इंजीनियरों की जबरदस्त मांग रही है। हर मां-बाप अपनी बेटी के लिए इन्हीं दोनों पेशों का वर चाहते रहे हैं। मजेदार बात है कि दुनिया के इतना बदलने के बावजूद इस रुझान में कोई खास फर्क नहीं आया। 30 फीसदी लोग अब भी इन्हीं पेशों को अहमियत देते हैं। इसका मूल कारण शायद यह है कि इनमें स्थायित्व है। हां, अब लड़कों की सोच भी इस बात को लेकर बदली है कि उनकी पत्नी को काम नहीं करना चाहिए। अब 47 फीसदी लड़के, (अधिकांश महानगरों में रहने वाले) कामकाजी पत्नी चाहते हैं। जाहिर है छोटे शहरों और कस्बों में रहने वालों की तुलना में महानगरों में रहने वालों की यह ज्यादा इच्छा होगी कि उनकी पत्नी कामकाजी हो। आठ शीर्ष महानगरों के 51 फीसदी युवक कामकाजी पत्नी को प्राथमिकता देते हैं, जबकि छोटे शहरों और कस्बों में रहने 44 फीसदी युवक कामकाजी पत्नी चाहते हैं। दिलचस्प रूप से 50 फीसदी से ऊपर महिलाओं ने यह माना कि शादी के बाद उनका काम करते रहना उनके पति पर निर्भर करता है।
सुधांशु गुप्त
वेलकम विंटर, थोड़ा सा रूमानी हो जाएं
प्रेम और रोमांस का मौसममनोवज्ञानिक भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि सर्दियां शुरू होते ही मन में प्रेम की कोंपलें फूटने लगती हैं। यही वजह है कि सर्दियों के मौसम को रूमानियत का मौसम माना जाता है। ढेरों शायरों ने इस मौसम को प्रेम के मौसम के रूप में चित्रित किया है। आज की युवा पीढ़ी भी इस मौसम को एंज्वॉय करने में किसी तरह की कोताही नहीं बरतती। यही कारण है कि लड़के-लड़कियों के ग्रुप बाग-बागीचों में, मॉल्स में, रेस्तराओं में, सड़कों पर, ऐतिहासिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन करते देखे ज सकते हैं। 24 वर्षीया एमबीए की छात्रा नेहा रावत कहती हैं, यूं तो हमारे लिए हर मौसम ही प्यार का मौसम होता है, लेकिन सर्दियों में प्रेम करने का अपना ही मजा है। केवल प्रेम करने का ही नहीं, साथ घूमना, फिरना, फिल्में देखना और तफरीह करना इस मौसम में किसे अच्छा नहीं लगेगा?
सजने-संवारने का मौसमयूं तो सजना-संवरना महिलाओं को (अब तो पुरुषों को भी) हर मौसम में अच्छा लगता है, लेकिन गर्मियों में पसीने के कारण महिलाओं का मेकअप अक्सर बेकार हो जता है। शायद इसीलिए बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि सजने-संवरने का असली मज सर्दियों में ही आता है। शायद यह मौसम का ही असर होता है कि सर्दियों में महिलाएं घर से बाहर निकलना ज्यादा पसंद करती हैं। मामला चाहे पार्टियों में जाने का हो, शॉपिंग पर जने का या फिर किटी पार्टी का, महिलाओं को यह पसंद आता है। वे सर्दियों के बहाने अपने भीतर की रूमानियत को भी जिलाये रखती हैं और मौसम का मजा भी लेती हैं। यही नहीं, कहते हैं कि सर्दियों में इनसान को भूख भी खूब लगती है और उसे भारी खाना भी आसानी से पच जाता है। इसलिए लोग सर्दियों में खान-पान को लेकर थोड़े से लापरवाह हो जाते हैं। जहिर है जब घूमना-फिरना होगा और अच्छा खान-पान होगा तो आपका स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। यानी सर्दियों का मौसम सेहत का मौसम भी है।
सौम्यता और सुलह का मौसमइस बात के कोई पुख्ता आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं कि गर्मियों में स्थानीय स्तर पर लोगों के झगड़े ज्यादा होते हैं या सर्दियों में। पर इतना निश्चित तौर पर कहा ज सकता है कि सर्दियों में व्यक्ित का स्वभाव थोड़ा शांत रहता है। इस मौसम में वह अमूमन उन बातों पर भी झगड़ा नहीं करता, जिन पर उसे झगड़ा कर लेना चाहिए। मनोवज्ञानिकों का तर्क है कि सर्दियों के मौसम में खीझ, बेचैनी नहीं होती, इसलिए व्यक्ति को जल्दी गुस्सा नहीं आता और लड़ाई होने की स्थितियां टल जती हैं। तो सर्दियों का मौसम इनसानी व्यवहार को भी नियंत्रित करता है।
सफर का मौसमसर्दियों का मौसम सफर का मौसम भी है। यकीनन सर्दियों के मौसम में घूमने का मज दोगुना हो जाता है। यही वजह है कि भारत में सर्दियों के मौसम में आने वाले पर्यटक कहीं ज्यादा होते हैं। इस मौसम में आपको न तो थकान का एहसास होता है और न ही पहाड़ों पर चढ़ने में खीझ का अनुभव होता है। यही वजह है कि लोग इस मौसम में पहाड़ों और हिल स्टेशनों की सैर करना चाहते हैं। सचमुच प्रकृति से साक्षात्कार का मौसम है सर्दियां।
बाजार को भाती सर्दियांबाजरों के भाव भी सर्दियों में चढ़ने लगते हैं। वे लोग जो गर्मियों में शॉपिंग करने से घबराते हैं, इस मौसम में घरों से बाहर निकलने लगते हैं। यही वजह है कि सर्दियों में बाजरों में ज्यादा भीड़ देखने को मिलती हैं। तो कहा जा सकता है कि ये सर्दियां ही हैं, जो हमारे भीतर की उत्सवधर्मिता को लगातार जिलाये रखती हैं।
सुधांशु गुप्त
करवाचौथ: आस्था को दें नये अर्थ
क्यों न इस बार करवाचौथ का एजेंडा कुछ इस तरह हो कि पति-पत्नी के रिश्तों की गर्माहट भी लौटे और लंबी उम्र की बजय हम जिंदगी को बेहतर तरीके से जीना भी सीखें? यहां हम पति पत्नी को कुछ ऐसे टिप्स दे रहे हैं, जिनके प्रयोग से पति पत्नी के रिश्तों की गर्माहट तो लौटेगी ही, साथ ही जीवन और इस रिश्ते को नये अर्थ मिलेंगे।
दोनों एक-दूसरे को पार्टनर समझेंआमतौर पर पति-पत्नी के बीच बॉस और कर्मचारी का-सा रिश्ता बन जता है। पत्नी भी पति को बॉस समझती है और पति तो खुद को बॉस समझता ही है। पत्नी को लगता है कि उसे अपने बॉस (पति) को हर हाल में खुश रखना है। वह अपनी खुशियों और अपनी संतुष्टि को अक्सर भूल जया करती है। पुरुषों के भीतर बैठा यही बॉस अक्सर उन्हें पत्नी से ‘हार्श’ बोलने पर मजबूर कर देता है। सबसे पहले इस स्थिति को दूर करें और एक-दूसरे को पार्टनर समङों। तभी आपका दांपत्य खुशहाल हो सकता है।
कोई भी फैसला दोनों मिल कर लेंअक्सर घर और बाहर से जुड़े अधिकांश फैसले पुरुष ही करते हैं। कोशिश करें कि मसला चाहे छोटा हो या बड़ा, कोई भी निर्णय दोनों-पति-पत्नी मिल कर ही लें। इससे एक और जहां पत्नी को बेहद खुशी होगी, वहीं पति को भी यह अच्छा लगेगा कि पत्नी हर काम और फैसले में उसकी भागीदार है।
पति-पत्नी की बजाय दोस्त बनेंआमतौर पर यह देखा जता है कि जब तक लड़का-लड़की एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, तब तक दोनों के रिश्ते ठीक रहते हैं, लेकिन शादी के बाद अचानक रिश्ते में बदलाव आने लगता है। लड़के की शिकायत होती है कि उसकी पत्नी (पूर्व प्रेमिका) अचानक घरेलू औरत में बदल गयी है, जबकि वह उसके भीतर अपनी प्रेमिका को ही तलाशता रहता है। यही बात दोनों को एक-दूसरे से दूर ले जती है। यह बात महिलाओं को भी समझनी चाहिए और कभी-कभी उन्हें पत्नियों की बजाय प्रेमिका और दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए।
एक-दूसरे की तारीफ करने की आदत डालेंपति-पत्नी अक्सर एक-दूसरे की तारीफ करने से बचते हैं। अगर पति कोई अच्छा काम करता है तो पत्नी को लगता है कि यह तो उसका फर्ज है। इसी तरह यदि पत्नी कोई अच्छा काम करती है तो पति उसकी तारीफ करने से बचता है, जबकि मानव व्यवहार भी यही कहता है कि एक-दूसरे की तारीफ करने से दोनों की आपस में मधुरता बढ़ती है।
खुद को अपडेट करेंआज की दुनिया तेजी से बदल रही है। महिलाएं और पुरुष कई बार यह मान कर चलते हैं कि अब जीवन में कुछ नया नहीं होना है, इसलिए वे पुराने संस्कारों और पुरानी तकनीक के साथ ही आगे बढ़ते हैं और यदि इनमें से एक पार्टनर आधुनिक होने लगता है तो भी रिश्ते में दरार पड़ने लगती है, इसलिए नयी और इनोवेटिव चीजों को सीखते रहें। इससे आप युवा भी रहेंगे और आपके रिश्ते की उम्र भी लंबी होगी।
संवाद बनाए रखें कई बार छोटे-छोटे झगड़ों के कारण पति-पत्नी के बीच संवादहीनता की स्थिति आ जाती है। पति-पत्नी दोनों ही सोचते रहते हैं कि वह क्यों संवाद शुरू करे। इसका परिणाम यह होता है कि घर में खामोशी पसरी रहती है और पति-पत्नी दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगती हैं, इसलिए बेहतर यही है कि आपसी संवाद को कभी खत्म न होने दें-चाहें आपस में लड़ाई ही क्यों न हो।
एक-दूसरे से चैट करेंएक-दूसरे को समय न देना महानगरों की सबसे बड़ी समस्या है। उस स्थिति में तो यह और भी मुश्किल हो जता है, जब पति-पत्नी दोनों काम करते हैं। मजेदार बात यह है कि इस स्थिति में पति नेट पर किसी से चैटिंग करता है तो पत्नी किसी और से। आपसी रिश्ते को बेहतर बनाने के लिए और एक दूसरे को समय न दे पाने की कमी पति-पत्नी नेट पर एक दूसरे से चैट करके पूरी कर सकते हैं।
एक-दूसरे के लिए खुद को बदलेंकई बार पति एक तरह की सोच का होता है और पत्नी दूसरी सोच की और दोनों ही एक-दूसरे के लिए बदलने को तैयार नहीं होते। इस स्थिति को बदलें और कोशिश करें कि एक दूसरे की रुचियों के अनुरूप बना जए। मिसाल के तौर पर पति को बाहर घूमने का शौक है तो पत्नी को भी उसके इस शौक को पूरा करने में सहयोग देना चाहिए और यदि पत्नी को शॉपिंग करना पसंद है तो पति को चाहिए कि वह पत्नी को शॉपिंग पर ले जाने में कोई गुरेज न करे।
सुधांशु गुप्त
आसमानों को छूने की आशा
ऐसा नहीं है कि छोटे शहरों की लड़कियों के सपने महज बॉलीवुड तक ही सीमित थे। शिक्षा, संगीत, नृत्य, व्यवसाय, मॉडलिंग, खेल और छोटा परदा छोटे शहरों की इन लड़कियों के बड़ा होने का गवाह बनने के लिए तैयार हो चुके थे। और लड़कियों को पहली बार लग रहा था कि घर के चौखट के बाहर की दुनिया ज्यादा रंगीन और सपनीली है। तो क्यों न इस दुनिया को पाने की कोशिश की जाए। और यह कोशिश कमोबेश हर पेशे में दिखाई दी।
गुजरे दो दशकों में छोटे परदे का जिस तेजी से विस्तार हुआ है, वह किसी को भी चकित कर देने वाला है। और यही परदा है, जिसने छोटी उम्र की लड़कियों, किशोरियों और युवतियों को अपने सपनों को सींचने का एक बड़ा प्लेटफॉर्म मुहैया कराया है। इंडियन आयडल, डांस इंडिया डांस, बूगी वूगी और कई दूसरे रियलिटी शोज ने लड़कियों को एक बड़ा मंच दिया। रांची की अलीशा हो या अगरतला की सुरभि इसी छोटे परदे ने इन्हें डांसर और सिंगर के रूप में एक पहचान दी है। बढ़ते धारावाहिकों ने छोटे शहरों की लड़कियों को अभिनय का भी मौका दिया। पटना की रतन राजपूत का मन पढ़ाई में कभी नहीं लगता था। उनका एकमात्र सपना था अभिनय करना। मेरठ से अपनी पढ़ाई करने के बाद वह अपने सपनों को पूरा करने के लिए सपनों की राजधानी दिल्ली चली आईं और यहां सचमुच उनके सपने हकीकत में बदलने लगे। रतन को ‘राधा की बेटियां कुछ कर दिखायेंगी’ धारावाहिक में काम करने का मौका मिल गया। वह ‘अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो’ धारावाहिक में भी काम कर रही हैं, लेकिन रतन का सपना है कि वह बड़े परदे पर भी काम करें। रतन ऐसी अकेली लड़की नहीं हैं। प्रतापगढ़ की श्वेता तिवारी, उज्जैन की जूही परमार जैसी न जाने कितनी लड़कियां हैं, जो आज छोटे परदे पर अपने सपनों को बड़ा होता देख रही हैं।
यकीनन, आज छोटे शहरों की लड़कियों के सपने बड़े हैं और वे केवल घर और वर के ही सपने नहीं देख रहीं, बल्कि उनके सपने आर्थिक आजादी हासिल करने, अपने फैसले खुद लेने, अपने अधिकारों के लिए लड़ने और आत्मनिर्भर होने पर केंद्रित हैं। और सच भी है कि जिन देशों में स्त्रियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो रही हैं, वहां समाज का स्तर और औरतों की जिंदगी में मूलभूत परिवर्तन आ रहा है। चीन, जापान, श्रीलंका, न्यूजीलैंड ऐसे ही मुल्क हैं। यहां की 75 फीसदी से अधिक महिलाएं रोजगार में लगी हैं। भारत में बेशक यह आंकड़ा इतना न हो, लेकिन जा हम भी उसी राह पर रहे हैं, जहां लड़कियों को सपने देखने, उन्हें पूरा करने और आत्मनिर्भर बनने के मौके और सहूलियतें होंगी। और तब छोटे शहरों की लड़कियां खिड़की के पास बैठ कर आसमान के खिड़की तक आने का इंतजार नहीं करेंगी, बल्कि वे बाहर निकल आसमान को अपनी मुट्ठी में भरने की कोशिश करेंगी।
खेलों की दुनिया भी आज छोटे शहरों की लड़कियों के चमत्कारों से गुलजार है। वास्तव में पिछले कुछ वर्षो में खेलों में भी जबरदस्त ग्लैमर आया है और लड़कियों को इसमें अपना शानदार करियर दिखाई देने लगा है। यही वजह है कि छोटे शहरों में पली-बढ़ी इन लड़कियों ने अनेक खेलों के जरिये अपने सपनों में रंग भरे हैं। हिसार में पैदा हुई सायना नेहवाल आज भारतीय बैडमिंटन की पर्याय बन चुकी हैं। बैडमिंटन कोर्ट में उनकी आक्रामकता देखते ही बनती है। सायना आज दुनिया की टॉप टैन बैडमिंटन खिलाड़ियों में हैं। इसी तरह आंध्र प्रदेश के गुडीवाड़ा की रहने वाली कोनेरू हंपी ने शतरंज की बादशाहत हासिल की है। वे दुनिया की नंबर दो महिला शतरंज खिलाड़ी हैं। उधर इम्फाल के बाहरी क्षेत्र कंगाथी की रहने वाली मैरी कॉम ने मुक्केबाजी में बुलंदियां छुई हैं तो हैदराबाद में जन्मी कर्णम मल्लेश्वरी ने कुश्ती में अपना और देश का नाम रोशन किया है।
1992 में मधु सप्रे मिस यूनिवर्स चुनी गयी थीं। उन्हें अपनी बोल्डनेस के लिए जाना जाता था और इसी के चलते वह कई बार विवादों में भी घिरीं, लेकिन छोटी उम्र की लड़कियों को रैंप पर चलने का सपना दिखाने वालों में मधु सप्रे का नाम अहम है। इसके बाद के वर्षो में कमोबेश हर बड़ी होती लड़की के जेहन में एक बार मॉडल बनने का ख्वाब जरूर सतह पर आया। और शायद इसी का परिणाम है कि आज तमाम छोटे शहरों की लड़कियां रैंप के सपने केवल देखती ही नहीं, बल्कि उन्हें पूरा भी कर रही हैं। उत्तर पूर्वी राज्य असम की रहने वाली मोनी कंगना दत्ता, उत्तर पूर्व की ही मौशमी गोगोई, हिसार की दीप्ति भटनागर, राजस्थान की लतिका चौहान आज रैंप पर अपने जलवे बिखेरती देखी जा सकती हैं। इनकी आंखों में पल रहे सुकून को देख कर लगता है कि इन्होंने रैंप चलने का जो सपना देखा था, वह तो पूरा हुआ है, लेकिन अभी इन्हें दूर तक जाना है।
अगर गौर से देखें तो पिछले कुछ वर्षो में बॉलीवुड में अनेक ऐसी अभिनेत्रियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, जो छोटे शहरों से बड़े सपने लेकर मुंबई पहुंची थीं। आज की शीर्ष अभिनेत्रियों में शुमार प्रियंका चोपड़ा जमशेदपुर में पैदा हुईं। उनका बचपन बरेली में बीता। और ये दोनों ही शहर उन्हें ऐसा कोई सपना नहीं दे पाये, जो उन्हें बॉलीवुड की क्वीन बना दे। पहले सन 2000 में प्रियंका मिसवर्ल्ड बनीं और देखते ही देखते वह बॉलीवुड पर छा गयीं। आज प्रियंका एक फिल्म के लिए पांच करोड़ रुपए मांग रही हैं। कंगना रानाउत शिमला के पास ही मंडी से बाहर निकलीं और बॉलीवुड में सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगीं। नीतू चंद्रा ने बिहार से आकर अपनी पहचान बनाई और मल्लिका सहरावत ने हरियाणा के करनाल से हॉलीवुड तक सफर अपने हौसले के दम पर पूरा किया। लारा दत्ता गाजियाबाद की गलियों से निकल कर मिस यूनिवर्स के खिताब तक पहुंचीं। और भी कई ऐसी अभिनेत्रियां हैं, जिन्होंने छोटे शहरों की तंग गलियों और कैद सपनों की दुनिया से बाहर निकल कर अपनी पहचान बनाई। आकाश में दूर तक उड़ने के सपने देखे और उन्हें साकार किया।
छोटे शहरों की लड़कियों ने न केवल सपने देखने शुरू कर दिये हैं, बल्कि वे उन्हें पूरा भी कर रही हैं। यही कारण है कि पिछले दो दशक में कमोबेश हर पेशे में छोटे शहरों की इन लड़कियों को बुलंदियों पर देखा जा सकता है। छोटे शहरों से बाहर निकली ये लड़कियां आज अपनी पहचान और आर्थिक आजादी की लड़ाई लड़ रही हैं।
सुधांशु गुप्त
शर्म क्यों मगर हमें नहीं आती!
कुंआरेपन की परीक्षा दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में पिछले दिनों एक बेहद शर्मनाक कांड सामने आया। पता चला कि मध्य प्रदेश में सामूहिक विवाह का एक आयोजन किया जाना है। इसमें बड़ी संख्या में दलित और आदिवासी महिलाओं ने शिरकत की। विवाह के लिए जो महिलाएं आई थीं, उनका सामूहिक स्तर पर कौमार्य परीक्षण किया गया यानी उनके कुंआरेपन की परीक्षा ली गई। बाद में इस कांड पर लीपापोती की गयी। सवाल यह उठता है कि क्या हम अभी भी आदिम युग में जी रहे हैं? कौमार्य परीक्षण जैसी चीजें क्या आज के इस आधुनिक युग को बर्बर युग साबित नहीं करतीं? और क्या कौमार्य परीक्षण पुरुषों का नहीं होना चाहिए था? इस कौमार्य परीक्षण ने भारतीय समाज की ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की स्त्री जाति को अपमानित किया। और इस परीक्षण ने एक और बात यह साबित की कि जब कौमार्य परीक्षण सामूहिक स्तर पर हो सकता है तो निजी स्तर पर पुरुष न जाने कितनी लड़कियों का कौमार्य परीक्षण कराते होंगे?
लड़कियों की हत्या के परंपरागत तरीके छोटी उम्र की लड़कियों को मारने के हमारे समाज में कई तरीके प्रचलित रहे हैं। तमिलनाडु में आज भी इस तरह की घटनाएं देखने को मिल जाती हैं, जिनमें अपनी ही बेटियों की हत्या के लिए मांबाप एरुक्कपाल नामक एक पौधे का इस्तेमाल करते हैं। इसके लस्सेदार दूध की कुछ बूंदें ही नवजात कन्या को मौत की नींद सुला देती हैं। कुछ मांबाप अपनी नवजात बच्ची की हत्या के लिए गाय के दूध में नींद की गोलियां मिला कर बच्ची को दे देते हैं। इसके अलावा गला घोंट देना, पानी भरी बाल्टी में डाल देना और बच्ची की छाती पर पत्थर रख कर उस पर बैठ जाना ऐसे ही कुछ खौफनाक तरीके हैं, जो हमारे विकासशील और आधुनिक होने के तमाम दावों को झूठा साबित करते हैं। अगर गौर से देखें तो आज भी कई गांवों के आसपास नवजात कन्याओं के शव मिलते ही रहते हैं, लेकिन इसके बावजूद हम शायद ही कभी सामूहिक शर्म का इजहार करते हों!
बच्चियों से बलात्कार हमारे देश में छह-छह माह की लड़कियों से बलात्कार की घटनाएं सामने आती हैं और यह भी सच है कि बच्चियों से बलात्कार की घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा है। बच्चियों से बलात्कार करने वाला बच्चियों को ही अपना शिकार इसलिए बनाता है, क्योंकि वे न विरोध कर सकती हैं, ना चीख सकती हैं और न ही बलात्कारी के खिलाफ कोई शिकायत कर सकती हैं। लेकिन क्या हम भी कोई विरोध नहीं कर सकते, इन मसलों पर चीख नहीं सकते और बलात्कारियों को सख्त सजा दिलाने का कानून नहीं बना सकते? विडम्बना यह है कि जिन मामलों में बलात्कारी पकड़े जाते हैं, उनमें से भी अधिकांश बलात्कारी छूट जाते हैं। बलात्कार कानून में भी उनके छूटने के तमाम रास्ते छूट गये हैं या जानबूझ कर छोड़े गये हैं। लेकिन फिर भी कोई इस पर शर्मिंदा नहीं है?
असुरक्षित महिलाएं हमारे समाज में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं, यह बात अब किसी से छिपी नहीं है। महानगरों में ही नहीं, छोटे कस्बों और गांवों तक में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कोई आश्वस्त नहीं है। विडंबना यह है कि महिलाएं और लड़कियां न केवल बाहर असुरक्षित हैं, बल्कि वे अपने घर में भी महफूज नहीं हैं। अगर ऐसा ना होता तो आए दिन आरुषि तलवार जसी लड़कियों को असमय मौत का शिकार न होना पड़ता। और घर से बाहर का आलम यह है कि जगह-जगह निठारी जसे कांड न जने कितनी लड़कियों को लील रहे हैं।
किन्नरों का आना घर में बेटा होने पर घर पर किन्नरों के आने का रिवाज न जने कितना पुराना है। पहले जब ‘हम दो, हमारे दो’ जसे परिवार नियोजन के नारे नहीं थे, तब घरों में ज्यादा बच्चे पैदा हुआ करते थे और किन्नर लड़कियों के जन्म पर नाचने नहीं आते थे, लेकिन अब क्योंकि घर में एक दो बच्चे ही होते हैं तो किन्नर कई बार लड़कियों के जन्म पर भी नाचने आ जते हैं, लेकिन वे लड़की के मां-बाप के सामने खुशी का इजहार नहीं करते, बल्कि उन्हें सांत्वना देते हैं, जो बेहद शर्मनाक है।
जन्म पर लोगों की प्रतिक्रियाएं अगर कुछ ठोस चीजों को छोड़ दिया जए तो समाज में लड़कियों के होने पर किस तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिलती हैं, उससे भी समाज में लड़कियों की स्थिति को जना ज सकता है। अक्सर आपने देखा होगा कि गर्भवती महिलाएं पहले से ही अपने बैडरूम में जो कैलेंडर या तस्वीरें लगाती हैं, वे लड़कों की होती हैं। यानी पहले से ही इसकी तैयारी होती है कि घर में बेटा पैदा होगा। यदि किसी गर्भवती महिला के पहले ही एक बेटी है (मान लीजिये 5-6 साल की) और वह मां से पूछती है कि मां तुम अस्पताल से क्या लाओगी तो मां कहती है-भैया। लेकिन यदि वही छोटी-सी लड़की पलट कर पूछ ले कि यदि अस्पताल वालों ने बहन दे दी तो? तो मां उसे समझती है कि गंदी बातें नहीं करते। मान लीजिए, वह महिला दोबारा बेटी को जन्म दे देती है तो अस्पताल की दाइयों से लेकर पूरा स्टाफ (़डॉक्टरों को छोड़ कर) उस महिला के प्रति सहानूभूति प्रकट करता दिखता है। आसपड़ोस और यार-दोस्त तक उसे बधाई देते हुए संकोच करते हैं। जरा सोचिए, जब समाज में लड़की के पैदा होने पर ही इस तरह का माहौल है तो आगे चलकर उसके साथ न्याय और समानता की बातें क्या संभव हैं?
लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या लिंग परीक्षण की आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों ने आज के इनसान को यह सुविधा मुहैया कराई है कि वह पहले ही जान सके कि स्त्री की कोख में पलने वाला बच्चा लड़का है या लड़की। लेकिन इस सुविधा का जितने बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हुआ है, उतना शायद ही किसी अन्य तकनालॉजिकल सुविधा का हुआ हो। इसने कन्या भ्रूण हत्या का ग्राफ पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ाया है। और यही वजह है कि लड़कियों का अनुपात लड़कों के मुकाबले लगातार कम हो रहा है। लाखों लड़कियां गायब हो रही हैं। बकौल अमत्र्य सेन- आने वाली पीढ़ियां आपसे इसका हिसाब जरूर पूछेंगी।
सुधांशु गुप्त
मंदी मंद न होने दें जीवन की रफ्तार
पूरी दुनिया इस समय जबरदस्त आर्थिक मंदी से गुजर रही है। भारत भी इसका अपवाद नहीं है। मंदी के जो बाहरी प्रभाव नजर आ रहे हैं, वे बताते हैं कि लाखों लोग इस मंदी में बेरोजगार हो गये हैं, लाखों लोगों की तनख्वाहें कम हो गयी हैं और वे लाखों लोग, जो रोजगार की तलाश में थे, उन्हें रोजगार मिलना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। लेकिन यही मंदी आपसी रिश्तों-खासतौर पर पति-पत्नी के रिश्तों-को कितना प्रभावित कर रही है, इस पर कोई व्यवस्थित अध्ययन सामने नहीं आया है, लेकिन इतना साफ है कि यह असर बहुत गहरा है। फिर भी जो अध्ययन हुए हैं, वे कुछ बातों की ओर इशारा करते हैं। एक अध्ययन बताता है कि जिनके पतियों की नौकरी छूट गयी है, उनमें से पचास फीसदी महिलाओं को लगता है कि वे खुद घर की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए अपने पतियों से ज्यादा मेहनत कर रही हैं। पचास से कुछ कम प्रतिशत महिलाओं को लगता है कि छंटनी होने के बाद उनके पति घर पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और घर के कामों में उनकी रुचि बढ़ गयी है। 46 फीसदी लोगों के घरों में झगड़े ज्यादा होने लगे हैं। 44 फीसदी पत्नियों का मानना है कि नौकरी जाने के बाद दोनों के बीच सेक्स संबंध कम बनते हैं और 30 फीसदी महिलाएं ईमानदारी से यह स्वीकारती हैं कि अब वे अपने पति के प्रति पहले की तरह आकर्षित नहीं होतीं।
एक और तथ्य यह है कि इस मंदी के बाद महिलाओं की बेरोजगारी दर में जहां 1.6 फीसदी का इजाफा हुआ है, वहीं पुरुषों का प्रतिशत 3.6 है यानी यह साफ है कि इस मंदी से नौकरीपेशा पुरुषों पर ज्यादा असर पड़ रहा है। जहां घर में केवल पुरुष ही एकमात्र कमाने वाला था, वहां पूरे घर को आर्थिक संकटों से गुजरना पड़ रहा है। लेकिन जहां पति-पत्नी दोनों वर्किंग थे और पति की नौकरी छूट गयी है, वहां संकट मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक ज्यादा है। पति नौकरी जाने के बाद पत्नी के सामने खुद को अपमानित महसूस करता है। उसे लगता है कि वह घर का प्रमुख होने के नाते घर को पालने-पोसने की जिम्मेदारियों को पूरा करने में असमर्थ रहा है। वह अपनी भावनाओं को अपनी पत्नी से भी शेयर नहीं कर पाता, इस डर से कि ऐसा करने से उसके भीतर और ज्यादा अपराध-बोध पैदा होगा। इस तरह नौकरी का जाना दोनों के बीच दरार का कारण बन सकता है, बन रहा है।
पति की नौकरी छूटने पर महिलाओं की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग हो सकती हैं। वे अपने पति पर ज्यादा क्रोध करने लगेंगी, उनके पति के प्रति आकर्षण में कमी आ जाएगी, पति के प्रति उनके सम्मान में कमी आ जाएगी और वे अपने पति के साइके को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित रहने लगेंगी। इसकी एक मनोवैज्ञानिक वजह यह है कि प्रोवाइडर की भूमिका में पति ही होता है और महिलाएं भी यही अपेक्षा करती हैं कि घर चलाने की जिम्मेदारी पति की है और उनकी बायोलॉजिकल और साइक्लॉजिकल स्थितियां उन्हें इससे इतर सोचने की इजाजत नहीं देतीं।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस दौर में अपनी भावनाओं, प्रतिक्रियाओं और तनाव को सही ढंग से प्रोसेस न किया जाए तो ये स्थितियां किसी दंपती को तलाक के रास्ते तक ले जा सकती हैं। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यदि इस दौर में अपनी भावनाओं, प्रतिक्रियाओं और तनाव को सही ढंग से प्रोसेस न किया जाए तो ये स्थितियां किसी दंपती को तलाक के रास्ते तक ले जा सकती हैं। इस स्थिति से निबटने के लिए मनोवैज्ञानिक कुछ सकारात्मक रास्ते सुझाते हैं, जिन पर चल कर इस अनचाही मंदी और रिश्तों पर उसके असर से निबटा जा सकता है और उसे कम किया जा सकता है।
संवाद : पति-पत्नी के बीच आपसी संवाद बेहद जरूरी है। पति की नौकरी चली गयी है तो पत्नी को चाहिए कि संवाद किसी भी हालत में समाप्त न हो। दोनों एक दूसरे से चीजों को शेयर करें और लगातार इस बात पर चर्चा करें कि क्या हो रहा है और क्या होगा। महिलाओं को चाहिए कि वे अपने डर और कुंठाएं (यदि कोई है) पति के सामने प्रकट न करें। पति के सामने उन्हें सकारात्मक बातें ही करनी चाहिएं।
मजबूत बनें: आप तभी अपने पति को भावनात्मक सपोर्ट दे सकती हैं, जब आप मजबूत हों। इसके लिए जरूरी है कि पहले तो आप अपनी देखभाल खुद करें। एक्सरसाइज करें, योगा करें और मानसिक रूप से मजबूत बनें। यदि जरूरत महसूस करती हैं तो अपने बाहरी दोस्तों और रिश्तेदारों की भी मदद ले सकती हैं। पति के सामने हर समय निराशा की बातें न करें। उन्हें यह समझाएं कि जीवन में इस तरह की स्थितियां आती रहती हैं और दोनों मिलकर ही इन स्थितियों का सामना कर सकते हैं।
आपने उससे शादी क्यों की: याद करिये कि जब आपने उन्हें अपने पति के रूप में चुना था तो आपको उनमें क्या-क्या अच्छी बातें दिखाई दी थीं। क्या वह बहुत हैंडसम हैं, ही मैन हैं, उनका सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत अच्छा है। जाहिर है आपने उनसे शादी केवल उनकी नौकरी देख कर ही नहीं की होगी। तो संकट की इस घड़ी में पति के दूसरे गुणों को तवज्जो दीजिए, ताकि नौकरी जाने से उनके भीतर जो अपमान और शर्मिंदगी का भाव पैदा हुआ है, वह कम हो और उनका आत्मविश्वास बना रहे। उन्हें इस तरह के मौके दीजिए कि वे अपनी ‘मैनलीनैस’ का प्रदर्शन कर सकें।
वर्कआउट टुगैदर : एक्सरसाइज तनाव दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है। दोनों मिल कर एक साथ एक्सरसाइज कीजिए। इससे दोनों का अवसाद और तनाव दूर होगा।
क्रिएटिव बनिये : टाइम पास करने के लिए क्रिएटिव तरीके तलाश करिये। मसलन पुरानी फोटो अलबम को सही कीजिए, पुरानी फैमिली वीडियोज देखिये और कभी-कभी शाम को यूं ही सड़क पर घूमने निकलिए। याद रखिए पति इस समय आपकी समय न दे पाने की सारी शिकायतें दूर कर सकता है।
थोड़ा सा रूमानी हो जाएं : अपने घर में आप एक ऐसा बॉक्स बना सकती हैं, जिसमें किसी एक विशेष दिन पति की तारीफ में कोई रोमांटिक बात कागज के टुकड़े पर लिख कर डाल दें। इससे दोनों के बीच आत्मीयता बढ़ेगी और पति को भी अच्छा लगेगा। इस तरह आप पति को होने वाली शर्मिंदगी से बचा सकती हैं और मंदी में भी जीवन की रफ्तार को बनाए रख सकती हैं। सुधांशु गुप्त
कंट्रोल जेड: जिंदगी में यह कमांड नहीं
सुधीर मिश्रा की उम्र 45 साल है और वह मीडिया से जुड़े है। वह अक्सर दुखी से होते हुए कहते हैं, यार हम लोग बड़े गलत समय पर पैदा हुए। काश, हम लोग दस-बीस साल बाद पैदा होते तो जिंदगी में बहुत कुछ देख सकते थे। जब हम बड़े और युवा हो रहे थे तो न कंप्यूटर था, न मोबाइल, न टेलीविजन का ही इतना विस्तार हुआ था और न ही उस समय का समाज इतना उदार था। सुधीर मिश्रा अकेले ऐसे शख्स नहीं हैं। तमाम लोग हैं। वास्तव में ये ठहर सी गयी उम्र के लोग युवाओं की तरह जिंदगी जीना चाहते हैं। इन्हें लगता है कि ये भी अपनी प्रेयसी को एसएमएस भेजें, बिंदास भाव से उनके साथ मैट्रो स्टेशन पर घूमें, मॉल जाएं, सिनेमा देखें और वह सब कुछ करें, जो वे अपनी उम्र में करना चाहते थे, लेकिन सुविधाएं न होने के कारण और माहौल न होने के कारण नहीं कर पाये।
बात सिर्फ जिंदगी को एन्जॉय करने की ही नहीं है। 48 वर्षीय जगमोहन उनियाल कहते हैं कि मैं उस समय बेहद अच्छा गाना गाता था। लेकिन मुझे कोई ऐसा माध्यम नहीं दिखाई पड़ता था, जहां सिंगिंग की मेरी प्रतिभा आकार ले सके। इसलिए बाथरूम में गाते-गाते ही मैं बुढ़ापे की ओर अग्रसर हो गया। काश, उस समय भी इतने टेलेंट हंट प्रोग्राम होते।
आखिर पिछले डेढ़ दशकों में हमारी दुनिया कितनी बदल गयी है, जिनका लाभ 40 की उम्र से ऊपर की पीढ़ी नहीं उठा पाई? कंप्यूटर, मोबाइल, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, निजी चैनल, मॉल्स की छोटे शहरों में भी बाढ़ सी आ गयी है। यही नहीं, इस दौरान हमारे मूल्य भी इतनी तेजी से बदले हैं कि हम खुद इस बदलाव पर चकित हैं। पहले जहां प्रेम के इजहार में सालों लग जाते थे, वहीं अब लड़के और लड़कियां भी बिना वक्त गंवाएं ऐसा कर लेते हैं। जब तक रिश्ता चला ठीक, वरना दूसरा घर देखो। प्रेम की जो काल्पनिक दुनिया थी, वह अब ठोस जमीन अख्तियार कर चुकी है। लिहाजा 40 से ऊपर के लोगों को लगता है कि क्यों न वे इस दौर में पैदा हुए?
लेकिन क्या सचमुच पुराने दौर में, अपनी उसी उम्र के साथ लौटना संभव है, जो गुजर चुकी है? समाजशास्त्री कहते हैं कि वक्त कभी लौट कर नहीं आता, लेकिन हर दौर में हर व्यक्ति को यह लगता है कि काश, उसका कुछ गुजरा हुआ समय वापस आ जाए, ताकि वह उसे और बेहतर ढंग से जी सके। और यह भी सच है कि किसी भी समाज में तकनीकी स्तर पर ही नहीं, बल्कि हर स्तर पर बदलाव और विकास होता रहता है। यह बदलाव भविष्य की पीढ़ियों के लिए होता है। इसलिए बेहतर यही है कि अपनी वर्तमान उम्र को अपने वर्तमान स्वरूप में ही जीया जाए। चालीस से पचास के बीच की उम्र भी आपको कुछ भी सीखने से नहीं रोकती और अपने आसपास आपको तमाम ऐसे लोग मिल जाएंगे, जो इसी उम्र में नयी तकनीक से वाकिफ हो रहे हैं और बाजार में अच्छा काम कर रहे हैं। आप भी खुद को फिट रख सकते हैं, म्यूजिक और डांस में रुचि ले सकते हैं और अपना मेकओवर कराकर खुद को युवा बनाए रख सकते हैं। और जहां तक रूमानियत का सवाल है तो आप अपने बच्चों और अन्य युवाओं को देखकर इस बात पर खुश हो सकते हैं कि जो आपको अपनी उम्र में नहीं मिला, वह नयी पीढ़ी को मिल रहा है।
आज मुझे कंप्यूटर पर काम करते हुए दस साल हो गये हैं और अब मैं समझ गया हूं कि कंट्रोल जेड कमांड का इस्तेमाल केवल तभी हो सकता है, जब तक आप कोई और कमांड न दें। और जिंदगी में तो हम सैकड़ों कमांड दे चुके हैं। इसलिए जिंदगी में कंट्रोल जेड संभव ही नहीं। ऐसे में यदि जिंदगी की कोई स्टोरी उड़ गयी है तो पुरानी इबारतों के मोह में न पड़कर अपनी जिंदगी की स्लेट पर नयी इबारत लिख लें। सुधांशु गुप्त
खतरों की नयी खिलाड़ी: मंदिरा बेदी
शांति, एक्स्ट्रा इनिंग और ढेर सारी फिल्में करने के बाद अब खतरों के खिलाड़ी-लेवल 2 में आप दिखाई देने वाली हैं? यह धारावाहिक करने की कोई खास वजह?वास्तव में जब मैंने पहले वाला खतरों के खिलाड़ी देखा तो मुङो बेहद अच्छा लगा था, खासतौर से जिस तरह अक्षय कुमार इस शो को हैंडल करते हैं। तभी मेरे मन में इस तरह का शो करने का विचार आया। लिहाजा जब मेरे पास खतरों के खिलाड़ी पार्ट-2 में काम करने का प्रस्ताव आया तो मैंने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। इस शो का हिस्सा बनने का अनुभव कैसा रहा?ग्रेट। इस शो में काम करने का अनुभव वाकई बहुत जबरदस्त रहा। इसकी एक वजह यह भी थी कि यह सीरियल केपटाउन की खूबसूरत लोके शंस पर शूट हुआ और केपटाउन मेरा प्रिय शहर है। मैंने वर्ल्ड कप 2003 यही शुरू किया था, जिसने मुझे काफी शोहरत दिलायी।
बारह हसीनाओं के एक साथ रहने से किसी किस्म की कोई प्रॉब्लम नहीं हुई, क्योंकि ये सभी बोल्ड लड़कियां हैं और इनका बाहर जबरदस्त कंपीटीशन रहता है? आपको किसी से कोई समस्या नहीं हुई? नहीं, मुझे किसी से कोई समस्या नहीं हुई, बल्कि इस दौरान अनुष्का मनचंदा और श्वेता साल्वे से मेरे अच्छे रिश्ते विकसित हुए।
क्या सीरियल की शूटिंग से पहले आपने कोई तैयारी भी की थी।फिजीकली, मैंने अपने लिए एक ट्रेनर रखा, जिसने मुझे इस शो में जाने से पहले पूरी तैयार करवाई, लेकिन मुङो व्यक्तिगत रूप से लगता है कि ऐसे शो में जाने से पहले मानसिक मजबूती की जरूरत पड़ती है। लिहाजा मैंने भी खुद को शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में तैयार किया।
इस बार क्या दर्शकों को कुछ अलग किस्म के स्टंट्स देखने को मिलेंगे?किस तरह के स्टंट्स होंगे, इस बारे में मैं कुछ नहीं बताऊंगी, लेकिन मैं इतना कह सकती हूं कि इस बार के स्टंट्स ज्यादा इनोवेटिव, स्टाइलिश और क्रिएटिव होंगे।
क्या आप जिंदगी को बहुत प्लान करके जीती हैं?एकदम नहीं। मैं जो काम मेरे रास्ते में आता है, उसे स्वीकार करती चलती हूं। मुझे बहुत योजनाबद्ध तरीके से जीना पसंद नहीं है।
आपके लिए एडवेंचर क्या है? जरूरी।
और जीवन में आप किससे सबसे ज्यादा डरती हैं? असफलता से।
सुधांशु
किताबों के लिए समय तलाशती जिंदगी
लोग सुबह सोकर उठते हैं तो उनके पास, उनके अवचेतन में पूरे दिन के काम की सूची होती है, एक अलिखित सूची, जिसे वे मशीनी अंदाज में पूरा करते हैं। पहले मॉर्निग वॉक, अखबार पढ़ना (अक्सर देखना), नित्यकर्म से निवृत्त होना और फिर इसी भागमभाग में ऑफिस के लिए रवाना होना। इसके बाद उसी तरह घर वापसी, फिर टेलीविजन पर देर रात तक आर्टिफिशयल सच का सामना। और इन सब कामों को करते हुए आपका मोबाइल है, जो हर समय बज-बज कर मानो आपके अस्तित्व के होने का अहसास कराता रहता है। आप चाहकर भी मोबाइल की उपेक्षा नहीं कर सकते! अब बताइये इस जीवनशैली में किताबों के लिए समय है कहां?
पुस्तक मेले की जरूरतलेकिन शायद इसी स्पेस को तलाशने के लिए और पाठकों में रीडिंग हैबिट लाने के लिए (कम से कम कहा तो यही जाता है) दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तक मेले का आयोजन हुआ है। यह पंद्रहवां पुस्तक मेला बताता है कि दिल्ली सरकार पिछले पंद्रह सालों से हर साल इस मेले का आयोजन करा रही है। मेले के उद्घाटन की औपचारिकता को पूरा करने के लिए कॉरपोरेट और अल्पसंख्यक मामलों के राज्यमंत्री सलमान खुर्शीद पहुंचे और उन्होंने किताबों और पुस्तक मेलों के बारे में ढेर सारी अच्छी-अच्छी बातें बताईं। उन्होंने कहा कि इस तरह के मेलों का आयोजन समाज के बौद्धिक विकास के लिए जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि किताबें ही बच्चों की सोच और उनका नजरिया तय करती हैं और जीवन में आगे बढ़ने की दिशा तय करती हैं।
टिकट विंडो पर कोई कतार नहींशनिवार (29 सितंबर) पुस्तक मेले का पहला दिन था और लोग रफ्ता-रफ्ता वहां पहुंच रहे थे। एक आशंका यह भी थी कि शनिवार होने की वजह से वहां भीड़ ज्यादा होगी, लेकिन टिकट खिड़की एकदम खाली थी। कोई इक्का-दुक्का व्यक्ति ही टिकट लेता नजर आया। शायद राजधानी में किसी भी चीज के लिए टिकट विंडो के बाहर लगने वाली लाइनों में यही एक ऐसी टिकट विंडो थी, जहां काफी-काफी देर बाद चंद लोग आ रहे थे। इस तरह यह टिकट लेने वालों के लिए काफी राहत की बात थी। हॉल नंबर 8 से 12 ए तक किताबों की एक ऐसी विशाल दुनिया यहां बिखरी पड़ी थी कि देखने वाला देखता ही रहा जाए। उधर, पूर्वी राज्यों के थीम पर आधारित इस पुस्तक मेले में अमेरिका, चीन, पाकिस्तान, यूएई और ईरान के प्रकाशक भी शामिल थे। यहां विदेशी और भारतीय प्रकाशकों के स्टॉल्स पर घूमते हुए और किताबों पर एक नजर डालते हुए यह साफ महसूस हो रहा था कि किताबों की दुनिया में कंटेंट के स्तर पर ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता और तकनीक के स्तर पर भी बेतहाशा बदलाव आए हैं और अब किताबें पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा आकर्षक और खूबसूरत ढंग से छप रही हैं। मेले में यूं तो हर उम्र के लोग दिखाई दिये, लेकिन अधिसंख्या में युवाओं को देख कर अच्छा लगा और यह और भी अच्छा लगा कि लोग (खासकर युवा) जे कृष्णामूर्ति फाउंडेशन के स्टॉल पर भी अच्छी खासी संख्या में नजर आए। गौरतलब है कि भारत के जे कृष्णमूर्ति एक ऐसे दार्शनिक हैं, जिन्होंने जीवन और मृत्यु से जुड़े सवालों पर लोगों से संवाद कायम किया है और इन सवालों के उत्तर तलाशने की कोशिश की है। तो क्या आज का युवा भी इन्हीं प्रश्नों से जूझ रहा है?
साहित्यिक कृतियों के अलावा जिस तरह की पुस्तकों के स्टॉल्स पर लोग अधिसंख्या में दिखाई दिए, उनमें पर्सेनेलिटी डेवलपमेंट, करियर, राजनीति, हिंदी साहित्य का इतिहास, एस्ट्रोलॉजी, बायोग्राफी और बच्चों के लिए पुस्तकें थीं। उन स्थानों पर तो भीड़ होना लाजिमी ही था, जिनके द्वारा छापी गईं किताबें किन्हीं भी कारणों से विवादास्पद हो गई हैं। इनमें राजपाल एंड संस द्वारा प्रकाशित किताब ‘जिन्ना : भारत-पाक विभाजन के आईने में’ मुख्य रही। जसवंत सिंह द्वारा लिखित इस किताब को लोग आश्चर्य से देख रहे थे और यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि क्या कोई किताब जसवंत सिंह जैसे व्यक्ति को पार्टी से निकलवा सकती है।
चेतन भगत बनाम प्रेमचंद
युवाओं खासकर लड़कियों के पसंदीदा लेखक के रूप में चेतन भगत का नाम एक बार फिर सामने आया, क्योंकि लड़कियां उनकी पहले से ही प्रचारित और पसंदीदा उपन्यासों- थ्री मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ, वन नाइट एट कॉल सेंटर आदि के प्रति आकर्षित दिखाई दे रही थीं। दिलचस्प बात यह दिखाई दी कि युवाओं में भी प्रेमचंद के प्रति खासा आकर्षण है और यही बात यह सोचने लिए प्रेरित कर रही थी कि क्या हम हिंदी में प्रेमचंद के बाद कोई ऐसा साहित्यकार नहीं तैयार कर पाये जो हमारे आज के दौर को समझ कर लिखे और युवाओं का प्रिय लेखक बन सके।
यह पुस्तक मेला छह सितंबर तक चलेगा और थोड़ी बहुत चहल-पहल बनी ही रहेगी। उसके बाद फिर हम सब अपने-अपने शहर की गति के हिसाब से जीवन चलाने लगेंगे। और मूल प्रश्न वहीं खड़ा होगा कि हमारी इस जीवनशैली ने किताबों के लिए स्पेस कहां छोड़ा है?
सुधांशु गुप्त
छोटे परदे पर बदल गया है खलनायिकाओं का चेहरा
अम्माजी के जुल्मों का कब अंत होगा..क्या यह इसी तरह वीरपुर के लोगों पर जुल्म ढाती रहेंगी? क्या अम्माजी को जेल हो जाएगी? क्या अम्माजी के खिलाफ शिया की लड़ाई बिना किसी परिणाम के दम तोड़ देगी? क्या इच्छा के खिलाफ नानी मां के षडयंत्रों का कभी अंत होगा? क्या दादी सा अपनी बालिका वधू आनंदी पर लगातार अत्याचार करती रहेंगी और घर के सब लोग खामोशी से उस पर अत्याचार होते देखते रहेंगे? क्या दादी सा सचमुच आनंदी को घर में वापस नहीं आने देंगी? ये तमाम सवाल आजकल टेलीविजन के शौकीनों को परेशान कर रहे हैं।
छोटे परदे पर आने वाले तीन धारावाहिकों - ना आना इस देश मेरी लाडो, उतरन और बालिका वधू - के ये तीन चेहरे - अम्माजी, दादी सा और नानी - वास्तव में खलनायिकाओं के नए चेहरे हैं। परंपराओं, रूढ़ियों, कुरीतियों और अज्ञानता से बने ये चेहरे आजकल छोटे परदे पर एक नए किस्म का आतंक मचाए हुए हैं। इन धारावाहिकों को देखने वाले लगातार यह उम्मीद कर रहे हैं कि छोटे परदे पर महिलाओं के इस आतंक की जल्द समाप्ति होगी, लेकिन इन धारावाहिकों के निर्माता जानते हैं कि इन महिलाओं के अत्याचारों के समाप्त होते ही लोगों की रुचि भी कम हो जाएगी।
दिलचस्प बात है कि कुछ साल पहले तक इसी छोटे परदे पर महिला खलनायिकाओं की एकदम अलग तस्वीर मौजूद थी। इनमें कोमोलिका-उर्वशी ढोलकिया (कसौटी जिंदगी की), पायल-जया भट्टाचार्य (सास भी कभी बहू थी) और पल्लवी-अंचित कौर (कहानी घर-घर की) के अलावा सुधा चंद्रन भी थीं, जिन्होंने शानदार ग्लैमरस ड्रेसेज, ब्रांडेड ज्वेलरी पहन कर और अलग-अलग आकार की खूबसूरत बिंदियां लगा कर घरों में षडयंत्रों, विवाहेतर संबंधों और छल-कपट को नए आयाम दिए। ये छोटे परदे का कल का खलनायिकी चेहरा था।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह एक काल्पनिक सा चेहरा था, इसमें रियलिटी नहीं थी। लेकिन अम्माजी (मेघना मलिक), दादी सा (सुरेखा सीकरी) और नानी मां (प्रतिमा काजमी) का वर्तमान खलनायिकी चेहरा (अतिश्योक्ति के बावजूद) रियलिटी के काफी करीब दिखाई पड़ता है।
खुद अम्माजी कहती हैं- आज के इस आधुनिक युग में भी भारत में अनेक ऐसे गांव हैं, जहां लड़कियों की गर्भ में ही हत्या करा दी जाती है। इस मामले में हरियाणा और राजस्थान सबसे आगे हैं। मुझे खुशी है कि 'ना आना इस देश मेरी लाडो' के जरिए मैं लोगों को यह समझाने में कामयाब हुई हूं कि क्या अच्छा है और क्या बुरा। लेकिन खलनायिकी के इस रियल चेहरे का दर्शकों पर कितना और क्या असर पड़ रहा है, इस बारे में मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख का कहना है कि वयस्क दर्शकों पर इसका कोई बहुत ज्यादा नेगेटिव असर नहीं होता, खासकर इसलिए भी क्योंकि वे जानते हैं कि परदे पर दिखाई जाने वाली बुराइयों का अंतत: अंत होता है।
लेकिन इस तरह की बुराइयों को ग्लैमराइज्ड ढंग से दिखाना नुकसानदेह हो सकता है। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक तो खलनायिकाओं का यही चेहरा दर्शकों को भाएगा।
सुधांशु गुप्त
सुरक्षा, सशक्तिकरण और महिलाएं
‘एक महिला के साथ गैंग रेप..शादी के लिए मना करने पर लड़की के चेहरे पर तेजाब फेंका..महिला की चाकू घोंप कर हत्या..दिनदहाड़े महिला का अपहरण करने की कोशिश..’ अखबारों में छाई रहने वाली ये खबरें अब आम खबरें बन चुकी हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता होगा, जब महिलाओं के साथ होने वाली बदसलूकियों की खबरें न छपती हों। अकारण नहीं है कि महिलाओं के साथ होने वाले इन अत्याचारों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है-बावजूद इसके कि सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर इन्हें रोकने के तमाम प्रयास किये जा रहे हैं।
महिला सशक्तिकरण के तमाम दावों के बीच आंकड़े बताते हैं कि सन 2008 में महिलाओं के साथ होने वाले 1,75, 200 मामले दर्ज किये गये थे। यानी देश में तीन मिनट से भी कम समय में कहीं न कहीं महिलाओं के साथ इस तरह के अपराध हो रहे हैं। ऐसा नहीं है कि पहले इन अपराधों को रोकने का कोई प्रयास नहीं हुआ। 1983 में दिल्ली पुलिस के प्रयासों से ‘क्राइम अंगेंस्ट वुमन सेल’का गठन किया गया था। इस पूरे प्रयास के पीछे तत्कालीन वरिष्ठ पुलिक अधिकारी कंवलजीत देओल थीं। इस सेल में महिलाओं को अपनी ही सुरक्षा के लिए विशेष प्रशिक्षण देने की भी व्यवस्था की गई थी। लेकिन इसके बावजूद महिलाओं के साथ होने वाले अपराध कम नहीं हुए। बल्कि उनका आंकड़ा लगातार बढ़ता रहा। तो क्या किया जाए? इसी सवाल का जवाब देने की कोशिश की विजन ग्रुप के चेयरमैन सुनील दुग्गल ने। उन्होंने ‘महिला सदा सुरक्षित’ नाम से एक पुस्तक लिखी और इसमें महिलाओं को सुरक्षित रहने के जरूरी टिप्स दिये। उन्होंने पुस्तक में यह बताने की कोशिश की कि किस तरह महिलाएं कुछ छोटी-छोटी बातों को जान और सीख कर अपनी सुरक्षा अपने आप कर सकती हैं। लेकिन सुनील दुग्गल का मन इसके बावजूद महिलाओं को सुरक्षित बनाने के लिए कुछ ठोस करना चाहता था। और उनकी इसी चाहत ने ‘सेफ वुमन फाउंडेशन’ नामक एक संगठन को जन्म दिया। इस प्रक्रिया में उन्होंने अपने साथ भारत होटल्स को भी जोड़ लिया। इस संगठन की गवर्निग बॉडी में भारत होटल्स की ज्योत्सना सूरी, ब्यूटीशियन वंदना लूथरा, पत्रकार बरखा दत्त और डीपीएस आरकेपुरम की पूर्व प्रिंसिपल डॉ. श्यामा चोना जैसी शख्सियतों को जोड़ा गया। इस संगठन की जरूरत क्यों पड़ी, इसके जवाब में एस. डब्ल्यू. एफ. की महासचिव सुरुचि दुग्गल कहती हैं, ‘हम काफी समय से यह देख और महसूस कर रहे थे कि लड़कियों के साथ होने वाले अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में हम चाहते थे कि लड़कियों के पास अपनी सुरक्षा करने के कुछ कारगर तरीके हों। साथ ही हम यह भी चाहते थे कि लड़कियों को इस तरह के टिप्स शुरुआती उम्र में ही दे दिये जाएं। हमारा मकसद लड़कियों को पूरी तरह से सुरक्षित बनाना है।’ वहीं डॉ. श्यामा चोना कहती हैं कि इस संगठन के जरिये हम लड़कियों के मन में बैठे सदियों के उस डर को दूर करना चाहते हैं कि वे कमजोर हैं, अबला हैं और अपनी सुरक्षा खुद नहीं कर सकतीं।
लेकिन यह सब कैसे होगा? इसके जवाब में सुरुचि दुग्गल का कहना है कि हम स्कूली स्तर पर ही लड़कियों को कुछ जरूरी टिप्स देना चाहते हैं कि किस संकट की स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए। इसके लिए हम स्कूलों में वर्कशॉप आयोजित करेंगे। ये वर्कशॉप्स नवीं से बड़ी क्लासेस के लिए होंगी। इसके बाद हम कॉलेज और कॉरपोरेट जगत में भी इस तरह की वर्कशॉप्स लगायेंगे, ताकि लड़कियों को यह समझया जा सके कि देर रात घर लौटते समय, सुनसान सड़क पर चलते समय या ऐसी ही अन्य किसी स्थिति में उन्हें क्या करना चाहिए? स्कूलों, कॉलेजों में वर्कशॉप लगाने के अलावा एसडब्ल्यूएफ के लोग देश के शिक्षा मंत्रालय से भी लगातार बातचीत कर रहे हैं, ताकि खुद को सुरक्षित रखने के जरूरी टिप्स करिकुलम में शामिल किये जा सकें। यदि ऐसा हो जाता है तो लड़कियां किशोरावस्था में ही यह सीख जाएंगी कि उन्हें आने वाले संकट से कैसे निबटना है। लेकिन क्या उस माहौल को भी बदलने की जरूरत नहीं है, जहां महिलाओं के साथ इस तरह के अपराध जन्म लेते हैं?
सुधांशु गुप्त
इन फिल्मों के रीमेक बनाइये
बेशक बॉलीवुड में फिल्मों के रीमेक का ट्रैंडनया नहीं है, लेकिन पिछले कुछ वर्षो में जिस तरह यह ट्रैंड जोर पकड़ रहा है, उससे ऐसा लगने लगा है कि बॉलीवुड के पास विषय लगभग समाप्त हो गये हैं। और चूंकि बॉलीवुड में सफलता को ही सलाम किया जाता है, इसलिए वे रीमेक के लिए ऐसी ही फिल्में चुनते हैं, जो अपने जमाने की हिट फिल्में रही हों। उन्हें लगता है कि फिल्म के साथ जुड़ा सफलता का टैग इस दौर में भी उनके लिए नयी सफलता लेकर आएगा। लेकिन ऐसा होता नहीं-हो नहीं रहा। रामगोपाल वर्मा ने ‘आग’ नाम से ‘शोले’ की रीमेक बनाया, लेकिन फिल्म न केवल औंधे मुंह गिरी, बल्कि रामगोपाल वर्मा को कड़ी आलोचना का भी शिकार होना पड़ा, यहां तक कि उन्होंने फिल्मों के रीमेक बनाने से ही तौबा कर ली। ‘डॉन’(अमिताभ बच्चन वाली) का रीमेक इसी नाम से बना और डॉन की भूमिका शाहरुख खान ने निभाई, लेकिन यह फिल्म भी फ्लॉपरही। रेखा द्वाराअभिनीत उमराव जान का रीमेक बना और इसमें उमराव जान की भूमिका ऐश्वर्या राय ने निभाई, लेकिन फिल्म फ्लॉप रही। दिलचस्प बात है कि जिन फिल्मों के रीमेक बन रहे हैं, वे सब अपने दौर की सुपर हिट फिल्में हैं, लेकिन इनके जो रीमेक बने हैं, वे कमोबेश सभी फ्लॉप रहे हैं। कारण एकदम साफ है। शोले अपने आप में एक संपूर्ण फिल्म थी और आप शोले का ऑरिजनल शोले से अच्छा रीमेक नहीं बना सकते। और जब रीमेक बनता है तो उसकी तुलना ऑरिजनल फिल्म से होना लाजिमी है। ऐसे में रीमेक ऑरिजनल फिल्म के सामने कहीं नहीं टिकता, क्योंकि दर्शकों के जेहन में ऑरिजनल फिल्म रहती है। उसके आधार पर वह रीमेक में दसियों कमियां निकालता है और फिल्म फ्लॉप हो जाती है। रीमेक फिल्मों में संजय लीला भंसाली की देवदास जरूर हिट कही जा सकती है। उसका कारण भी यह रहा कि फिल्म में कहानी को मूल रखते हुए केवल वातावरण और कॉस्ट्यूम ही बदले गये। यानी फिल्म की कहानी वही रही, केवल कहानी के पात्रों को हाई-फाई माहौल में पहुंचा दिया गया। कहानी वही रहने के कारण इमोशंस भी वही रहे और फिल्म हिट हो गयी। लेकिन ऐसा हर रीमेक के साथ नहीं हो सकता। एक और बात यह कि पुराने दौर में तमाम ऐसी फिल्में भी हैं, जो अपने दौर की महत्त्वपूर्ण फिल्में थीं, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर वे फ्लॉप साबित हुईं। कमाल अमरोही की रजिया सुल्तान, राज कपूर की मेरा नाम जोकर, श्याम बेनेगल की शतरंज के खिलाड़ी, बोनी कपूर की रूप की रानी चोरों का राजा, गुलजार की लेकिन, मनोज कुमार की पेंटर बाबू, एम. एफ हुसैन की गजगामिनी, राजश्री प्रोड्क्शंस की हम साथ-साथ हैं जैसी ना जानें कितनी फिल्में हैं, जिन्हें उस समय बहुत महत्त्वाकांक्षी फिल्में माना गया था। तकनीकी रूप से भी इन फिल्मों में बहुत ज्यादा मेहनत की गयी थी, लेकिन इसके बावजूद ये फिल्में कोई बड़ा कमाल नहीं दिखा पाईं। मीरा, लम्हे, सेंसर, मासूम, मृत्युदाता भी इसी तरह की फिल्में हैं। लेकिन फिल्म निर्माता-निर्देशकों को यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि रीमेक के लिए हिट फिल्मों का चयन दर्शकों की उम्मीदें बढ़ा देगा और उन उम्मीदों पर खरा उतरना आसान नहीं होगा, इसलिए बेहतर यही होगा कि ऐसी फिल्मों के रीमेक बनाए जाएं, जो अपने दौर की महत्त्वाकांक्षी फिल्में थीं, जिनका विषय अच्छा था, लेकिन इसके बावजूद वे फिल्में फ्लॉप हो गईं।
आजकल बॉलीवुड में हिट फिल्मों के रीमेक बनाने का ट्रैंड जोर पकड़ रहा है, लेकिन अधिकांश रीमेक फ्लॉप साबित हो रहे हैं। बॉलीवुड के निर्माता-निर्देशकों के लिए क्या ये बेहतर नहीं होगा कि उन फिल्मों का रीमेक बनाएं, जो अपने दौर की महत्त्वाकांक्षी फिल्में थीं, जिनके विषय बहुत अच्छे थे, लेकिन इसके बावजूद वे फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो पाईं।
सुधांशु गुप्त
खुद वर चुनने की आजादी है स्वयंवर
भारतीय समाज में स्वयंवर की एक पुरानी परंपरा रही है। स्वयंवर संस्कृत के स्वयं और वर शब्दों से मिल कर बना है, जिसका अर्थ होता है खुद अपना वर चुनना। प्राचीन समय में बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपनी बेटियों के लिए बड़े भव्य स्तर पर स्वयंवर का आयोजन किया करते थे। इसमें आसपास और दूर-दराज के सभी ताकतवर राजकुमारों को बाकायदा आमंत्रण भेजा जाता था। जो राजकुमार स्वयंवर की शर्तो पर खरा उतरता था, उसका विवाह राजकुमारी से हो जाता था। रामायण में राजा जनक ने अपनी बेटी सीता के लिए और महाभारत में महाराजा ध्रुपद ने अपनी बेटी द्रौपदी के लिए स्वयंवर का आयोजन किया था। शिव का धनुष तोड़ कर भगवान राम सीतापति बने और मछली की आंख में निशाना लगा कर अजरुन ने द्रौपदी को पाया। इसके अलावा नल-दमयंती और पृथ्वीराज-संयोगिता भी महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्वयंवरों के पात्र हैं, लेकिन इन ऐतिहासिक और पौराणिक स्वयंवरों में वर चुनने की लड़की की आजादी के मुकाबले स्वयंवर कराने वाले की प्रतिष्ठा और ताकत का प्रदर्शन ज्यादा दिखाई पड़ता है। जरा सोचिए कि सीता के स्वयंवर में यदि रावण को शिव का धनुष तोड़ने का अवसर मिल जाता तो क्या सीता को रावण से विवाह नहीं करना पड़ता?
सवाल परंपरागत तरीके से स्वयंवर रचाने का नहीं है। सवाल इस बात का है कि लड़कियों को अपना वर चुनने की कितनी आजादी हम दे रहे हैं और कितनी आजादी लड़कियों को चाहिए? प्रशासनिक सेवा में जाने की इच्छुक 24 वर्षीया सीमा का कहना है, ‘देश को आजादी मिले 62 साल हो चुके हैं, लेकिन विडंबना यह है कि देश की आधी आबादी अब भी आजादी से वंचित है। अपना वर चुनना तो दूर की बात है, लड़कियों को अपने से ही जुड़े छोटे-छोटे फैसले लेने का भी अधिकार नहीं है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि यह एक ऐसे देश में होता है, जिस देश की राष्ट्रपति तक महिला है।’ कमोबेश सीमा के ही तर्क से इत्तेफाक रखती हैं डॉ. नुसरत। उनका कहना है, ‘अगर सही अर्थो में देखा जाए तो आजादी केवल पुरुषों को ही है। बेशक बाहर से ऐसा लगता हो कि महिलाएं आजाद हो रही हैं, लेकिन सच इससे एकदम उलट है। बड़े शहरों तक में लड़कियों को अपना जीवनसाथी चुनने की आजादी नहीं है।’
लड़कियों को अपना वर चुनने की आजादी मिल रही है या नहीं, यह बहस तलब हो सकता है, लेकिन यह कतई बहस तलब नहीं है कि आज लड़कियां अपने लिए हर तरह की आजादी की हिमायती हैं-स्वयंवर की भी। शायद यह भी एक वजह है कि वे राखी के स्वयंवर में भी अपनी ही विजय देखती हैं। पच्चीस वर्षीय एमबीए की छात्र मीनाक्षी का कहना है, ‘राखी सावंत ने जो कदम उठाया है, उसने स्त्री जाति के मन में एक नई प्रेरणा पैदा की है। अब लड़कियां चाहती हैं कि वे खुद अपना वर बिना किसी डर के चुनें।’ 28 वर्षीय सुधा सिंह पेशे से अध्यापिका हैं। वह लड़कियों के वर चुनने की आजादी को एकदम अलग अंदाज में देखती हैं। उनका कहना है, ‘जब आप समलैंगिकों तक को विवाह करने की आजादी दे रहे हैं तो लड़कियों को अपना वर चुनने की आजादी क्यों नहीं मिलनी चाहिए। निश्चित रूप से मिलनी चाहिए। और राखी का स्वयंवर प्रतीकात्मक अर्थो में ही सही, यह आजादी देता दिखाई पड़ता है। ’
सुधांशु गुप्त
अब राम रसोई नहीं रही त्योहारों की धुरी
नया दौर और नये मूल्य
यह नया दौर है। एक ऐसा दौर, जहां आए दिन टैक्नोलॉजी बदल रही है, बाजार का विस्तार हो रहा है और लगभग हर चीज रेडीमेड उपलब्ध है-वह भी आपकी पसंद के अनुसार। ऐसे में त्योहारों की धुरी परपंरागत राम रसोई नहीं रह गयी है। 30 वर्षीया नीलम का कहना है कि ‘आखिर त्योहारों पर सभी को एन्ज्वॉय करने का हक होना चाहिए। और यदि कुछ सदस्य दिन भर रसोई में ही घुसे रहेंगे तो त्योहारों का आनंद कैसे उठाएंगे?’ वह कहती हैं, ‘जन्माष्टमी पर बाजार में हर तरह की मिठाई उपलब्ध है, फिर क्यों हम लोग दिन भर मेहनत करते रहें? बल्कि हम तो त्योहारों के मौके पर खाना भी बाहर ही पसंद करते हैं।’ यकीनन बहुत से लोग अब त्योहारों पर बाहर रेस्तरांओं में खाना पसंद करते हैं। रेस्तरांओं में त्योहारों पर वीकएंड्स से भी ज्यादा भीड़ नजर आती है।
बदली हैं प्राथमिकताएं
पिछले दो दशकों में लोगों की प्राथमिकताएं बहुत ज्यादा बदल गई हैं। सब बिजी हो गए हैं। उन्हें यह भी पसंद नहीं कि त्योहार रसोई के ही इर्द-गिर्द सिमट जाएं। ऐसा नहीं है कि वे त्योहारों को मनाना नहीं चाहते। वे बाकायदा त्योहारों का आनंद उठाना चाहते हैं, लेकिन रसोई में बैठ कर नहीं। त्योहारों पर एकदूसरे से मिलना-जुलना, गिफ्ट्स बांटना, शॉपिंग करना अब अनिवार्य हो चला है। त्योहार अब संपर्क, संबंध बनाने के माध्यम हो चले हैं। गिफ्ट्स खरीदने में भले ही हजारों स्वाहा हो जाएं, पकवान बनाने में जरूर महंगाई का रोना सुनाई देता है।
एकल परिवार ने बदला मिजाज
यह भी सच है कि पिछले दो दशकों में भारत में एकल परिवारों की अवधारणा ने मजबूती से अपने पैर जमाए हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि घर में पति-पत्नी के अलावा एक या दो जन और होते हैं। ऐसे में मिठाइयां या अन्य चीजें बनाने का कोई औचित्य दिखाई नहीं पड़ता। पहले के दौर में संयुक्त परिवार हुआ करते थे और घर की सारी महिलाएं मिल कर गुजिया, पंजीरी, नमक पारे, शक्कर पारे और अन्य पकवान घर पर ही बना लिया करती थीं। घर में क्योंकि ज्यादा जन थे, इसलिए बनाने और खाने-खिलाने में मजा आता था। अलग-अलग महिला सदस्य के सुपुर्द अलग-अलग काम सौंप दिए जाते थे और हंसी-मजाक के बीच कब पकवानों के घान कढ़ाई से उतर तश्तरी तक आ जाते थे, पता ही नहीं चलता था। त्योहारों पर पक्के खाने का रिवाज था। आज की हैल्थ कॉन्शस पीढ़ी को वह पारंपरिक खाना भी रास नहीं आता। आज एकल परिवारों में घर में पकवान बनाना खटराग सा लगता है। अकेले न यह काम करना रास आता है, न अकेले बैठ कर खाना ही अच्छा लगता है। इसलिए कदम खुद-ब-खुद बाजार की ओर बढ़ जाते हैं। हैमबर्गर, पित्जा, चाऊमीन, मोमोज, डिमसम्स खाने की शौकीन बच्चा पार्टी भी रसोई में बनती मिठाइयों की गंध से अब नहीं बौराती। नयी तकनालॉजी ने बदली रसोई की शक्ल
अगर गौर से देखा जाए तो पिछले दो-तीन दशकों में तमाम ऐसे उपकरण बाजार में आए हैं, जिन्होंने महिलाओं के रसोई के काम को आसान बनाया है। माइक्रोवेव, जूसर-मिक्सर-ग्राइंडर, फूड प्रोसेसर, सैंडविच मेकर, टोस्टर, रोटी मेकर और ना जाने क्या-क्या। इन तमाम उपकरणों ने जहां महिलाओं को रसोई में कड़ी मेहनत करने से बचाया है, वहीं उन्हें इस बात का मौका भी मुहैया कराया है कि वे रसोई से बाहर की दुनिया में भी काम कर सकें। यही वजह है कि जब त्योहारों पर महिलाएं रसोई में काम करती भी हैं तो उन्हें वहां लगातार नहीं बने रहना पड़ता। सब काम उपकरण करते हैं और त्योहार होने के बावजूद बेचारी रसोई कई बार उदास-सी नजर आती है। शहरों की भागमभाग
पिछले कुछ वर्षो में महिलाएं बड़ी संख्या में घर से बाहर निकली हैं-काम के लिए, आर्थिक आजादी के लिए। नेहा टंडन को उस वक्त नौकरी की जरूरत महसूस हुई, जब उनका बेटा 14 साल का हो गया। वह कहती हैं, ‘अब बच्चे बड़े हो गये हैं। मैं पढ़ी-लिखी हूं। अब मुझे काम मिल गया तो मैं इससे खुश हूं।’ जाहिर है घर से दफ्तर और दफ्तर से घर करती महिलाएं जन्माष्टमी की एक छुट्टी में रसोई का कितना हुनर दिखा पाएंगी।
महंगाई मार गई
महंगाई ने भी रसोई का दम निकाल दिया है। त्योहारों के पकवानों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के दाम आसमान छू रहे हैं। जो सचमुच राम रसोई की महत्ता जानते भी हैं वे भी चिरौंजी, मखाने, खाने वाली गोंद, गोला, बादाम, मावा, देसी घी के दाम सुन पस्त से हो जाते हैं। जितने में पकवानों का सामान आएगा, उतने में तो घर का राशन आ जाएगा। मंदिर के आगे के दीये भी अब देसी घी से नहीं जलते, उनमें भी सरसों के तेल की लौ टिमटिमाती है।
जाहिर है इन और इन जैसे तमाम दूसरे कारणों ने रसोई को त्योहारों की धुरी नहीं रहने दिया है और उसकी जगह अब बाजार ने ले ली है।
सुधांशु गुप्त
रक्षाबंधन: यूं भी तो हो सकता है..
अब ये लड़कियां क्या करें? हमने कुछ ऐसी ही लड़कियों से बातचीत की। अमूमन सभी लड़कियों का यह मानना था कि भाई न होने का उन्हें या उनके अभिभावकों को कोई अफसोस नहीं है। वे इस दिन या तो अपने पिता, चाचा को राखी बांधती हैं या फिर छोटी बहन से राखी बंधवा कर वे उसे उसकी सुरक्षा का वचन देती हैं। 18 वर्षीया गार्गी शर्मा पत्रकारिता की छात्र हैं। वह कहती हैं, मेरी 12 वर्षीय छोटी बहन है मैत्रेयी। मुङो कभी इस बात का अफसोस नहीं हुआ कि मेरा भाई नहीं है। मेरे लिए रक्षाबंधन का अर्थ है सेलिब्रेशन और मैं हर रक्षाबंधन पर अपनी छोटी बहन से राखी बंधवाती हूं और एक तरह से उसकी सुरक्षा का वचन देती हूं। बकौल गार्गी, लेकिन अगर मैं उससे राखी न भी बंधवाऊं तो मुङो कोई फर्क नहीं पड़ता। उसकी सुरक्षा को मैं अपनी जिम्मेदारी मानती हूं।
बेशक लड़कियों की सोच को उदारीकरण और बढ़ते बाजार के प्रभाव ने बदला है। 9 वर्षीया मान्या गुप्ता अपने पिता और चाचा को राखी बांधती है। उसकी इकलौती 3 वर्षीया बहन आर्या अभी यह सब समझने लायक नहीं है। लेकिन मान्या कहती है, मुङो अपनी बहन से राखी बंधवाने में कोई ऐतराज नहीं। 12वीं कक्षा में पढ़ने वाली कृति की एक छोटी बहन है प्रगति। कृति रक्षा बंधन को भाई-बहन का ही पर्व मानती है, लिहाजा अपने चचेरे भाइयों से राखी बंधवाती है। उसका कहना है, यह भाई बहन का त्योहार है और हमें इसे इसी रूप में रहने देना चाहिए। 13 वर्षीया सौम्या और 21 वर्षीया शैव्या भी इसी सोच की हैं। सौम्या कहती हैं, मेरे लिए रक्षाबंधन का अर्थ है सेलिब्रेशन और मैं अपनी बड़ी बहन को राखी बांध कर ही रक्षा बंधन मनाती हूं। द्वितीय वर्ष की छात्र प्रीति की भी एक बहन है भावना। बकौल प्रीति, वक्त के हिसाब से त्योहारों के स्वरूप में भी बदलाव आना चाहिए। आखिर हम क्यों भाइयों का इंतजार करते रहें? क्या हम किसी से कम हैं। मैं अपनी छोटी बहन के लिए भाई भी हूं और उससे ही राखी बंधवाती हूं।
किसी भी त्योहार का मतलब होता है सेलिब्रेशन और रक्षाबंधन भी सेलिब्रेशन के लिए ही है। ऐसे में जिन घरों में बेटियां ही हैं, वे क्यों इस त्योहार के दिन भाइयों के न होने का मलाल करें? क्या ये बेहतर नहीं कि वक्त और बदलती दुनिया के मद्देनजर ये बेटियां अपनी ही बहनों से राखी बंधवा कर इस उत्सव को नये अर्थ देने की कोशिश करें।
सुधांशु गुप्त
आइला पहचान कौन
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन भी बड़े परदे पर खुद को एक स्त्री के रूप में देखने का लोभ नहीं छोड़ पाये। उन्होंने ‘लावारिस’ फिल्म में स्त्री परिधानों में बाकायदा एक गीत गाया- मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है.. ऐसा नहीं है कि बड़े परदे पर केवल नायक ही स्त्री रूप में दिखा, इसके विपरीत नायिकाओं को भी कुछेक फिल्मों में पुरुष रूप में देखा गया। याद कीजिए ‘विक्टोरिया नंबर 203’, जिसमें सायरा बानो फिल्म के काफी हिस्से तक एक पुरुष के रूप में मौजूद रहीं। इसी तरह ‘हिम्मत’ में मुमताज पुरुष रूप में दिखाई गयी थीं। मुमताज और फिल्म के नायक पर एक बेहद लोकप्रिय गाना भी पिक्चराइज हुआ था-अगर तू लड़की होती.. ‘बैंडिट क्वीन’ में सीमा बिस्वास के पूरे परिधान पुरुषों वाले ही थे। लेकिन बॉलीवुड में चल रही क्रॉस ड्रेसिंग की बात की जाए तो नायिकाओं के मुकाबले नायकों की ही संख्या ज्यादा है, जो विपरीत लिंगी परिधानों में दिखाई पड़ते हैं। गोविंदा ने ‘आंटी नंबर 1’ में स्त्री का किरदार निभाया। ‘बाजी’ में आमिर खान एक सुंदर सी लड़की के रूप में दिखाई दिये थे। इससे पहले विश्वजीत, संजीव कुमार, पेंटल, षि कपूर, सलमान खान, प्राण, अनुपम खेर जैसे अभिनेता भी कभी-कभी बड़े परदे पर स्त्री रूप में दिखाई दिये हैं। लेकिन बीच में एक ऐसा दौर आया था, जब क्रॉस ड्रेसिंग की प्रवृत्ति कम दिखाई दे रही थी। लेकिन बॉलीवुड के बदलते मिजाज के चलते एक बार फिर से यह प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है। युवा दिलों की धड़कन कहे जाने वाले इमरान खान ‘जाने तू या जाने ना’ में साड़ी पहन कर एक गाना गाते दिखाई पड़ते हैं। ‘अग्ली और पगली’ में रणवीर शौरी पेटीकोट पहन कर साइकिल चलाते दिखाई पड़ते हैं। रानी मुखर्जी यशराज फिल्म्स की ‘दिल बोले हड़िप्पा’ में एक सिख के रूप में दिखाई देंगी। क्रॉस ड्रेसिंग के मामले में छोटे परदे ने भी काफी उदारता दिखाई है। कॉमेडी शोज में तो आये दिन परफोर्मेस देने वाले विपरीत लिंगी परिधानों में ही दिखाई पड़ते हैं। मजेदार बात है कि सोनी पर कॉमेडी धारावाहिक का एक पूरा एपिसोड क्रॉस ड्रेसिंग पर ही आधारित था।
अब अहम सवाल आता है कि ऐसा क्यों होता है? अगर बाहरी तौर पर देखा जाए तो फिल्मों में कई बार नायक या नायिका को अपनी पहचान छुपानी पड़ती है। मिसाल के तौर पर ‘बीवी और मकान’ नामक एक फिल्म में दो दोस्त मकान की तलाश कर रहे हैं। लेकिन कोई भी उन्हें इसलिए मकान नहीं देता, क्योंकि वे दोनों अविवाहित हैं, जबकि मकान मालिक पति-पत्नी को मकान देना चाहता है। लिहाजा दोनों में से एक भेस बदल कर स्त्री रूप धारण कर लेता है, इसलिए वह विपरीत लिंगी रूप में नजर आता या आती है। कई बार ऐसा भी होता है कि महज हास्य पैदा करने के लिए नायक या नायिका विपरीत रूपों में दिखाई पड़ते हैं। लेकिन इसके पीछे एक मनोवैज्ञानिक कारण भी दिखाई पड़ता है। हमारे समाज में भगवान शिव को अर्धनारीश्वर का दर्जा दिया गया है। माना जाता है कि परम पुरुष भगवान शिव ने जब ब्रह्मांड की रचना कर दी तो खुद को अकेला महसूस किया। उनके मन में विचार आया : एकोùहं बहुस्यामि यानी मैं एक हूं अनेक हो जाऊं। इसके बाद उन्होंने खुद को दो हिस्सों में बांट लिया। एक हिस्सा वह खुद थे और दूसरा पार्वती का था। इस तरह अर्धनारीश्वर की अवधारणा पूर्ण होती है। यों भी कहा जाता है कि हर व्यक्ति के भीतर एक स्त्री और हर स्त्री के भीतर एक पुरुष होता है। बॉलीवुड में क्रॉस ड्रेसिंग का यह ट्रेंड कहीं इसी प्रवृत्ति को संतुष्ट करने का परिणाम तो नहीं?
इसके पक्ष में एक विज्ञापन याद आता है। बॉलीवुड में मिस्टर परफेक्ट कहे जाने वाले आमिर खान टाटा स्काई के एक विज्ञापन में आधे पुरुष और आधे नारी के रूप में नजर आये थे। 70 सेकेंड के इस विज्ञापन में आमिर का आधा हिस्सा एक पंजाबी लड़की का था और आधा एक लड़के का। दिलचस्प रूप से इस विज्ञापन को भी खास पसंद किया गया था। क्रॉस ड्रेसिंग के इस पौराणिक और मनोवैज्ञानिक तर्को को यदि छोड़ दें और चीजों को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो एक बात और इसके पक्ष में कही जा सकती है। वह यह कि बॉलीवुड की नयी पीढ़ी ने सेक्स से जुड़े सारे पूर्वाग्रहों को दरकिनार करते हुए क्रॉस ड्रेसिंग से जुड़े सारे प्रयोगों को स्वीकारा है। प्रतियोगिता के इस युग में वे सफलता और कम्फर्ट चाहते हैं, इसके लिए उन्हें चाहे जिस तरह का रूप अख्तियार करना पड़े।
क्रॉस ड्रेसिंग के जरिये पुरुषों द्वारा महिलाओं के किरदार निभाने का बॉलीवुड में एक लंबा इतिहास रहा है। पर बॉलीवुड में एक समय ऐसा भी था, जब पुरुष ही नायिकाओं की भूमिका निभाते थे। यह वह समय था, जब फिल्मों में लड़कियों के काम करने को अच्छा नहीं माना जाता था और अच्छे घरों की लड़कियां फिल्मों में काम नहीं करती थीं। इस स्थिति को अगर छोड़ दें तो भी तमाम ऐसी फिल्में हमें दिखाई पड़ती हैं, जिनमें नायक, बेशक कुछ ही दृश्यों में सही, स्त्री परिधानों यानी क्रॉस ड्रेसिंग में नजर आए।
सुधांशु गुप्त
